यीशु के परम पवित्र हृदय का महापर्व


📒 पहला पाठ:1 राजाओं 7:6-11

6 उसने पचास हाथ लम्बा और तीस हाथ चैड़ा स्तम्भ वाला कक्ष बनवाया। उसके सामने खम्भों का छतदार मण्डप था।

7 फिर उसने सिंहासन-कक्ष और न्यायालय बनवाया, जिस में वह न्याय करने वाला था।

8 उसने उस में फ़र्श से छतगीरी तक देवदार लकड़ी के तख्ते लगवाये। उसका अपना निवास-भवन इसके पीछे था। वह भी इसी प्रकार का था। सुलेमान ने फ़िराउन की पुत्री के लिए, जिसके साथ उसने विवाह किया था, इस कक्ष के समान एक महल बनवाया।

9 ये सब इमारतें, प्रवेश से बड़े आँगन तक और नींव से छत तक, बढ़िया पत्थरों से बनाये गये, जो माप के अनुसार कट कर पीछे और सामने से आरे से छाँटे गये थे।

10 नींव में बड़े-बड़े गढ़े हुए पत्थर रखे गये, जो आठ-आठ और दस-दस हाथ के थे।

11 उनके ऊपर बढ़िया गढ़े हुए पत्थर और देवदार की धरनें रखी गयीं।


📙 दूसरा पाठ: 1 योहन 4:7-16

7 प्रिय भाइयो! हम एक दूसरे को प्यार करें, क्योंकि प्रेम ईश्वर से उत्पन्न होता है।

8 जौ प्यार करता है, वह ईश्वर की सन्तान है और ईश्वर को जानता है। जो प्यार नहीं करता, वह ईश्वर को नहीं जानता; क्येोंकि ईश्वर प्रेम है।

9 ईश्वर हम को प्यार करता है। यह इस से प्रकट हुआ है कि ईश्वर ने अपने एकलौते पुत्र को संसार में भेजा, जिससे हम उसके द्वारा जीवन प्राप्त करें।

10 ईश्वर के प्रेम की पहचान इस में है कि पहले हमने ईश्वर को नहीं, बल्कि ईश्वर ने हम को प्यार किया और हमारे पापों के प्रायश्चित के लिए अपने पुत्र को भेजा।

11 प्रयि भाइयो! यदि ईश्वर ने हम को इतना प्यार किया, तो हम को भी एक दूसरे को प्यार करना चाहिए।

12 ईश्वर को किसी ने कभी नहीं देखा। यदि हम एक दूसरे को प्यार करते हैं, तो ईश्वर हम में निवास करता है और ईश्वर के प्रति हमारा प्रेम पूर्णता प्राप्त करता है।

13 यदि वह इस प्रकार हमें अपना आत्मा प्रदान करता है, तो हम जान जाते हैं कि हम उस में और वह हम में निवास करता है।

14 पिता ने अपने पुत्र को संसार के मुक्तिदाता के रूप में भेजा। हमने यह देखा है और हम इसका साक्ष्य देते हैं।

15 जो यह स्वीकार करता है कि ईसा ईश्वर के पुत्र हैं, ईश्वर उस में निवास करता है और वह ईश्वर में।

16 इस प्रकार हम अपने प्रति ईश्वर का प्रेम जान गये और इस में विश्वास करते हैं। ईश्वर प्रेम है और जो प्रेम में दृढ़ रहता है, वह ईश्वर में निवास करता है और ईश्वर उस में।


📘 सुसमाचार : मत्ती 11:25-30

25 उस समय ईसा ने कहा, “पिता! स्वर्ग और पृथ्वी के प्रभु! मैं तेरी स्तुति करता हूँ; क्योंकि तूने इन सब बातों को ज्ञानियों और समझदारों से छिपा कर निरे बच्चों पर प्रकट किया है।

26 हाँ, पिता! यही तुझे अच्छा लगा।

27 मेरे पिता ने मुझे सब कुछ सौंपा है। पिता को छोड़ कर कोई भी पुत्र को नहीं जानता। इसी तरह पिता को कोई भी नहीं जानता, केवल पुत्र जानता है और वही, जिस पर पुत्र उसे प्रकट करने की कृपा करे।

28 “थके-माँदे और बोझ से दबे हुए लोगो! तुम सभी मेरे पास आओ। मैं तुम्हें विश्राम दूँगा।

29 मेरा जूआ अपने ऊपर ले लो और मुझ से सीखो। मैं स्वाभाव से नम्र और विनीत हूँ। इस तरह तुम अपनी आत्मा के लिए शान्ति पाओगे,

30 क्योंकि मेरा जूआ सहज है और मेरा बोझ हल्का”।