आगमन का दूसरा सप्ताह

आज के संत:संत लूसिया

📒पहला पाठ- प्रवक्ता 48: 1-4, 9-11

1 “याकूब के वंशजो! मेरी बात सुनो! तुम्हारा नाम इस्राएल है। तुम यूदा के वंशज हो। तुम प्रभु का नाम ले कर शपथ खाते हो। तुम इस्राएल के ईश्वर की दुहाई देते हो, किन्तु तुम में सच्चाई और धार्मिकता की कमी है।

2 वे अपने को पवित्र नगर के निवासी कहते हैं और इस्राएल के ईश्वर पर भरोसा करते हैं, जिसका नाम ‘विश्वमण्डल का प्रभु’ है।

3 मैंने प्राचीन काल से प्रारम्भ की घटनाओं की भविष्यवाणी की; मैंने अपने ही मुख से उनकी घोषणा की है। मैंने उन्हें अचानक कार्य में परिणत किया और वे पूरी हो गयीं।

4 मैं जानता था कि तुम हठीले हो; तुम्हारी गरदन लोहे की तरह और तुम्हारा माथा काँसे की तरह कठोर है।

9 मैंने अपना क्रोध अपने नाम के कारण भड़कने नहीं दिया। मैंने अपने गौरव के कारण अपने पर नियन्त्रण रखा और तुम्हारा विनाश नहीं किया।

10 देखो, मैंने तुम को शु़द्ध किया, किन्तु चाँदी की तरह आग में नहीं, बल्कि मैंने विपत्ति की भट्ठी में तुम्हारा परिष्कार किया।

11 मैंने अपने कारण ही यह किया। मैं अपना नाम कलंकित नहीं होने दूँगा, मैं अपनी महिमा किसी दूसरे को प्रदान नहीं करूँगा।

📙सुसमाचार- मत्ती 17:10-13

10 इस पर उनके शिष्यों ने उन से पूछा, “शास्त्री यह क्यों कहते हैं कि पहले एलियस को आना है?” 

11 ईसा ने उत्तर दिया, “एलियस अवश्य सब कुछ ठीक करने आयेगा।

12 परन्तु मैं तुम लोगों से कहता हूँ- “एलियस आ चुका है। उन्होंने उसे नहीं पहचाना और उसके साथ मनमाना व्यवहार किया। उसी तरह मानव पुत्र भी उनके हाथों दुःख उठायेगा”।

13 तब वे समझ गये कि ईसा योहन बपतिस्ता के विषय में कह रहे हैं।