आगमन काल का तीसरा रविवार

📒 पहला पाठ: इसायाह 61: 1-2, 10-11

1 प्रभु का आत्मा मुझ पर छाया रहता है, क्योंकि उसने मेरा अभिषेक किया है। उसने मुझे भेजा है कि मैं दरिद्रों को सुसमाचार सुनाऊँ, दुःखियों को ढारस बँधाऊँ; बंन्दियों को छुटकारे का और कैंदियों को मुक्ति का सन्देश सुनाऊँ;

2 प्रभु के अनुग्रह का वर्ष और ईश्वर के प्रतिशोध का दिन घोषित करूँ; विलाप करने वालों को सान्त्वना दूँ,

10 मैं प्रभु में प्रफुल्लित हो उठता हूँ, मेरा मन अपने ईश्वर में आनन्द मनाता है। जिस प्रकार वह याजक की तरह मौर बाँध कर और वधू आभूषण पहन कर सुशोभित होते हैं, उसी प्रकार प्रभु ने मुझे मुक्ति के वस्त्र पहनाये और मुझे धार्मिकता की चादर ओढ़ा दी है।

11 जिस प्रकार पृथ्वी अपनी फ़सल उगाती है और बाग़ बीजों को अंकुरित करता है, उसी प्रकार प्रभु-ईश्वर सभी राष्ट्रों में धार्मिकता और भक्ति उत्पन्न करेगा।


📙 दूसरा पाठ: 1 थेसेलनीकियों 5: 16-24

16 आप लोग हर समय प्रसन्न रहें,

17 निरन्तर प्रार्थना करते रहें,

18 सब बातों के लिए ईश्वर को धन्यवाद दें; क्योंकि ईसा मसीह के अनुसार आप लोगों के विषय में ईश्वर की इच्छा यही है।

19 आत्मा की प्रेरणा का दमन नहीं करें

20 और भविष्यवाणी के वरदान की उपेक्षा नहीं करें;

21 बल्कि सब कुछ परखें और जो अच्छा हो, उसे स्वीकार करें।

22 हर प्रकार की बुराई से बचते रहें।

23 शान्ति का ईश्वर आप लोगों को पूर्ण रूप से पवित्र करे। आप लोगों का मन, आत्मा तथा शरीर हमारे प्रभु ईसा मसीह के दिन निर्दोष पाये जायें।

24 ईश्वर यह सब करायेगा, क्योंकि उसने आप लोगों को बुलाया और वह सत्यप्रतिज्ञ है।


📘 सुसमाचार : योहन 1: 6-8, 19-28

6 ईश्वर को भेजा हुआ योहन नामक मनुष्य प्रकट हुआ।

7 वह साक्षी के रूप में आया, जिससे वह ज्योति के विषय में साक्ष्य दे और सब लोग उसके द्वारा विश्वास करें।

8 वह स्वयं ज्यांति नहीं था; उसे ज्योति के विषय में साक्ष्य देना था।

19 जब यहूदियों ने येरूसालेम से याजकों और लेवियों को योहन के पास यह पूछने भेजा कि आप कोन हैं,

20 तो उसने यह साक्ष्य दिया- उसने स्पष्ट शब्दों में यह स्वीकार किया कि मैं मसीह नहीं हूँ।

21 उन्होंने उस से पूछा, “तो क्या? क्या आप एलियस हैं?” उसने कहा, “में एलियस नहीं हूँ”। “क्या आप वह नबी हैं?” उसने उत्तर दिया, “नहीं”।

22 तब उन्होंने उस से कहा, “तो आप कौन हैं? जिन्होंने हमें भेजा, हम उन्हें कौनसा उत्तर दें? आप अपने विषय में क्या कहते हैं?”

23 उसने उत्तर दिया, “मैं हूँ- जैसा कि नबी इसायस ने कहा हैं- निर्जन प्रदेश में पुकारने वाले की आवाज़ः प्रभु का मार्ग सीधा करो”।

24 जो लोग भेजे गये है, वे फ़रीसी थे।

25 उन्होंने उस से पूछा, “यदि आप न तो मसीह हैं, न एलियस और न वह नबी, तो बपतिस्मा क्यों देते हैं?”

26 योहन ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तो जल में बपतिस्मा देता हूँ। तुम्हारे बीच एक हैं, जिन्हें तुम नहीं पहचानते।

27 वह मेरे बाद आने वाले हैं। मैं उनके जूते का फीता खोलने योग्य भी नहीं हूँ।”

28 यह सब यर्दन के पास बेथानिया में घटित हुआ, जहाँ योहन बपतिस्मा देता था।