आगमन काल
संत जॉन ऑफ द क्रॉस, पुरोहित एवं कलीसिया के धर्मशास्त्री

📒 पहला पाठ: इसायाह 24: 2-7, 15-17

2 याजकों की वही दशा होगी, जो जनता की; जैसा स्वामी के साथ होगा, वैसा दास के साथ; जैसा स्वामिनी के साथ, वैसा दासी के साथ; जैसा बेचने वाले के साथ, वैसा ख़रीदने वाले के साथ; जैसा उधार देने वाले के साथ, वैसा उधार लेने वाले के साथ; जैसा साहूकार के साथ, वैसा कर्जदार के साथ।

3 समस्त पृथ्वी उजड़ जायेगी, वह पूरी तरह लुट जायेगी; प्रभु ने यह निर्णय किया है।

4 पृथ्वी शोक मनाती हुई कुम्हला रही है, समस्त संसार मुरझा रहा है। आकाश और पृथ्वी नष्ट हो रहे हैं।

5 पृथ्वी के निवासियों ने उसे अपवित्र किया है, उन्होंने प्रभु के नियमों का उल्लंघन किया, उसके आदेश का तिरस्कार किया और प्राचीन विधान को रद्द कर दिया है।

6 इसलिए अभिशाप पृथ्वी का विनाश कर रहा है और उसके निवासियों को पापों का फल भोगना पड़ेगा। इसलिए पृथ्वी के निवासी समाप्त हो रहे हैं- थोड़े ही लोग शेष रहे हैं।

7 नयी अंगूरी सूख रही है, दाखलता कुम्हला रही है। आनन्द मनाने वाले आह भर रहे हैं।

15 पूर्व में प्रभु का स्तुतिगान करो, समुद्र के द्वीप-समूह में इस्राएल के प्रभु-ईश्वर के नाम की महिमा गाओ।

16 पृथ्वी के सीमांतों से हमें न्यायप्रिय ईश्वर का स्तुतिगान सुनाई पड़ता है। किन्तु मैं कहता हूँः “हाय, मैं छीजता जा रहा हूँ। मैं शोक से घुल रहा हूँ। विश्वासघाती सक्रिय हैं- वे विश्वासघात-पर-विश्वासघात करते जाते हैं।”

17 पृथ्वी के निवासियों! तुम्हारे भाग्य में आतंक, गर्त्त और फन्दा है।


📘 सुसमाचार : मत्ती 21: 23-27

23 जब ईसा मन्दिर पहुँच गये थे और शिक्षा दे रहे थे, तो महायाजक और जनता के नेता उनके पास आ कर बोले, “आप किस अधिकार से यह सब कर रहे हैं? किसने आप को  यह अधिकार दिया?”

24 ईसा ने उन्हें उत्तर  दिया, “मैं भी आप लोगों से एक प्रश्न पूछना चाहता हूँ। यदि आप मुझे इसका उत्तर देंगे, तो मैं भी आप को बता दूँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।

25 योहन का बपतिस्मा कहाँ का था? स्वर्ग का अथवा मनुष्यों का?” वे यह कहते हुए आपस में परामर्श करते थे- “यदि हम कहें: ‘स्वर्ग का’, तो यह हम से कहेंगे, ‘तब आप लोगों ने उस पर विश्वास क्यों नहीं किया?’

26 यदि हम कहें: ‘मनुष्यों का’….,  तो जनता से डर है; क्योंकि सब योहन को नबी मानते हैं।”                 

27 इसलिए उन्होंने ईसा को उत्तर दिया, “हम नहीं जानते”। इस पर ईसा ने उन से कहा, “तब मैं भी आप लोगों को नहीं बताऊँगा कि मैं किस अधिकार से यह सब कर रहा हूँ।