छठवाँ सामान्य रविवार

📒 पहला पाठ: प्रवक्ता 15: 15:20

15 उसने अपनी आज्ञाऍँ एवं आदेश प्रकट किये और मनुष्य पर अपनी इच्छा प्रकट की है।

16 यदि तुम चाहते हो, तो आज्ञाओें का पालन कर सकते हो; ईश्वर के प्रति ईमानदार रहना तुम्हारी इच्छा पर निर्भर है।

17 उसने तुम्हारे सामने अग्नि और जल, दोनों रख दिये हाथ बढ़ा कर उन में एक का चुनाव करो।

18 मनुष्य के सामने जीवन और मरण, दोनों रखे हुए हैं। जिसे मनुष्य चुनता, वही उसे मिलता है।

19 ईश्वर की प्रज्ञा अपार है। वह सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है।

20 वह अपने श्रद्धालु भक्तों की देखरेख करता है। मनुष्य जो भी करते हैं, वह सब देखता रहता है।


📙 दूसरा पाठ: 1 कुरिन्थियों 2: 6-10

6 आप लोगों के समुदाय ने उस व्यक्ति को जो दण्ड दिया है, वह पर्याप्त है।

7 अब आप को उसे क्षमा और सान्त्वना देनी चाहिए। कहीं ऐसा न हो कि वह दुःख में डूब जाये।

8 इसलिए मैं आप से निवेदन करता हूँ कि आप उसके प्रति प्रेम दिखाने का निर्णय करें।

9 मैंने आपकी परीक्षा लेने के उद्देश्य से भी लिखा था। मैं यह जानना चाहता था कि आप सभी बातों में आज्ञाकारी हैं या नहीं।

10 जिसे आप क्षमा करते हैं, उसे मैं भी क्षमा करता हूँ। जहाँ तक मुझे क्षमा करनी थी, मैंने आप लोगों के कारण मसीह के प्रतिनिधि के रूप में क्षमा प्रदान की है;


📘 सुसमाचार: मत्ती 5 17:37

17 तब गेरासेनी ईसा से निवेदन करने लगे कि वे उनके प्रदेश से चले जायें।

18 ईसा नाव पर चढ़ ही रहे थे कि अपदूतग्रस्त ने बड़े आग्रह के साथ यह प्रार्थना की- “मुझे अपने पास रहने दीजिए”।

19 उसकी प्रार्थना अस्वीकार करते हुए ईसा ने कहा, “अपने लोगों के पास अपने घर जाओ और उन्हें बता दो कि प्रभु ने तुम्हारे लिए क्या-क्या किया है और तुम पर किस तरह कृपा की है”।

20 वह चला गया और सारे देकापोलिस में यह सुनाता फिरता कि ईसा ने उसके लिए क्या-क्या किया था और सब लोग अचम्भे में पड़ जाते थे।

21 जब ईसा नाव से उस पार पहॅूचे, तो समुद्र के तट पर उनके पास एक विशाल जनसमूह एकत्र हो गया।

22 उस समय सभागृह का जैरूस नाम एक अधिकारी आया। ईसा को देख कर वह उनके चरणों पर गिर पड़ा

23 और यह कहते हुए अनुनय-विनय करता रहा, “मेरी बेटी मरने पर है। आइए और उस पर हाथ रखिए, जिससे वह अच्छी हो जाये और जीवित रह सके।”

24 ईसा उसके साथ चले। एक बड़ी भीड़ उनके पीछे हो ली और लोग चारों ओर से उन पर गिरे पड़ते थे।

25 एक स्त्री बारह बरस से रक्तस्राव से पीड़ित थी।

26 अनेकानेक वैद्यों के इलाज के कारण उसे बहुत कष्ट सहना पड़ा था और सब कुछ ख़र्च करने पर भी उसे कोई लाभ नहीं हुआ था।

27 उसने ईसा के विषय में सुना था और भीड़ में पीछे से आ कर उनका कपड़ा छू लिया,

28 क्योंकि वह मन-ही-मन कहती थी, ’यदि मैं उनका कपड़ा भर छूने पाऊॅ, तो अच्छी हो जाऊँगी’।

29 उसका रक्तस्राव उसी क्षण सूख गया और उसने अपने शरीर में अनुभव किया कि मेरा रोग दूर हो गया है।

30 ईसा उसी समय जान गये कि उन से शक्ति निकली है। भीड़ में मुड़ कर उन्होंने पूछा, “किसने मेरा कपड़ा छुआ?”

31 उनके शिष्यों ने उन से कहा, “आप देखते ही है कि भीड़ आप पर गिरी पड़ती है। तब भी आप पूछते हैं- किसने मेरा स्पर्श किया?”

32 जिसने ऐसा किया था, उसका पता लगाने के लिए ईसा ने चारों ओर दृष्टि दौड़ायी।

33 वह स्त्री, यह जान कर कि उसे क्या हो गया है, डरती- काँपती हुई आयी और उन्हें दण्डवत् कर सारा हाल बता दिया।

34 ईसा ने उस से कहा, “बेटी! तुम्हारे विश्वास ने तुम्हें चंगा कर दिया है। शान्ति प्राप्त कर जाओ और अपने रोग से मुक्त रहो।”

35 ईसा यह कह ही रहे थे कि सभागृह के अधिकारी के यहाँ से लोग आये और बोले, “आपकी बेटी मर गयी है। अब गुरुवर को कष्ट देने की ज़रूरत ही क्या है?”

36 ईसा ने उनकी बात सुन कर सभागृह के अधिकारी से कहा, “डरिए नहीं। बस, विश्वास कीजिए।”

37 ईसा ने पेत्रुस, याकूब और याकूब के भाई योहन के सिवा किसी को भी अपने साथ आने नहीं दिया।