सामान्य काल का तैंतीसवाँ रविवार
📒 पहला पाठ: सूक्ति-ग्रन्थ 31: 10-13, 19-20, 30-31
10 सच्चरत्रि पत्नी किसे मिल पाती है! उसका मूल्य मोतियों से भी बढ़कर है।
11 उसका पति उस पर पूरा-पूरा भरोसा रखता और उस से बहुत लाभ उठाता है।
12 वह कभी अपने पति के साथ बुराई नहीं, बल्कि जीवन भर उसक भलाई करती रहती है।
13 वह ऊन और सन ख़रीदती और कुशल हाथों में कपड़े तैयार करती है।
19 उसके हाथों में चरखा रहा करता है; उसकी उँगलियाँ तकली चलाती हैं।
20 वह दीन-दुःखियों के लिए उदार है और ग़रीबों को सँभालती है।
30 रूप-रंग माया है और सुन्दरता निस्सार है। प्रभु पर श्रद्धा रखने वाली नारी ही प्रशंसनीय है।
31 उसके परिश्रम का फल उसे दिया जाये और उसके कार्य सर्वत्र उसकी प्रशंसा करें।
📙 दूसरा पाठ: 1 थेसेलनीकियों 5: 1-6
1 (1-2 भाइयो! आप लोग अच्छी तरह जानते हैं कि प्रभु का दिन, रात के चोर की तरह, आयेगा। इसलिए इसके निश्चित समय के विषय में आप को कुछ लिखने की कोई ज़रूरत नहीं है।
3 जब लोग यह कहेंगे: ’अब तो शान्ति और सुरक्षा है’, तभी विनाश उन पर गर्भवती पर प्रसव-पीड़ा की तरह, अचानक आ पड़ेगा और वे उस से बच नहीं सकेंगे।
4 भाइयो! आप तो अन्धकार में नहीं हैं, जो वह दिन आप पर चोर की तरह अचानक आ पड़े।
5 आप सब ज्योति की सन्तान हैं, दिन की सन्तान हैं। हम रात या अन्धकार के नहीं है।
6 इसलिए हम दूसरों की तरह नहीं सोयें, बल्कि जगाते हुए सतर्क रहें।
📘 सुसमाचार : मत्ती 25: 14-30
14 नाव से उतर कर ईसा ने एक विशाल जनसमूह देखा। उन्हें उन लोगों पर तरस आया और उन्होंने उनके रोगियों को अच्छा किया।
15 सन्ध्या होने पर शिष्य उनके पास आ कर बोले, “यह स्थान निर्जन है और दिन ढल चुका है। लोगों को विदा कीजिए, जिससे वे गाँवों में जा कर अपने लिए खाना खरीद लें।”
16 ईसा ने उत्तर दिया, “उन्हें जाने की ज़रूरत नहीं। तुम लोग ही उन्हें खाना दे दो।”
17 इस पर शिष्यों ने कहा, “पाँच रोटियों और दो मछलियों के सिवा यहाँ हमारे पास कुछ नहीं है”।
18 ईसा ने कहा, “उन्हें यहाँ मेरे पास ले आओ”।
19 “ईसा ने लोगों को घास पर बैठा देने का आदेश दे कर, वे पाँच रोटियाँ और दो मछलियाँ ले लीं। उन्होंने स्वर्ग की ओर आँखें उठा कर आशिष की प्रार्थना पढ़ी और रोटियाँ तोड़-तोड़ कर शिष्यों को दीं और शिष्यों ने लोगों को।
20 सबों ने खाया और खा कर तृप्त हो गये, और बचे हुए टुकड़ों से बारह टोकरे भर गये।
21 भोजन करने वालों में स्त्रियों और बच्चों के अतिरिक्त लगभग पाँच हज़ार पुरुष थे।
22 इसके तुरन्त बाद ईसा ने अपने शिष्यों को इसके लिए बाध्य किया कि वे नाव पर चढ़ कर उन से पहले उस पार चले जायें; इतने में वे स्वयं लोगों को विदा कर देंगे।
23 ईसा लोगों को विदा कर एकान्त में प्रार्थना करने पहाड़ी पर चढ़े। सन्ध्या होने पर वे वहाँ अकेले थे।
24 नाव उस समय तट से दूर जा चुकी थी। वह लहरों से डगमगा रही थी, क्योंकि वायु प्रतिकूल थी।
25 रात के चौथे पहर ईसा समुद्र पर चलते हुए शिष्यों की ओर आये।
26 जब उन्होंने ईसा को समुद्र पर चलते हुए देखा, तो वे बहुत घबरा गये और यह कहते हुए, “यह कोई प्रेत है”, डर के मारे चिल्ला उठे।
27 ईसा ने तुरन्त उन से कहा, “ढारस रखो; मैं ही हूँ। डरो मत।”
28 पेत्रुस ने उत्तर दिया, “प्रभु! यदि आप ही हैं, तो मुझे पानी पर अपने पास आने की आज्ञा दीजिए”।
29 ईसा ने कहा, “आ जाओ”। पेत्रुस नाव से उतरा और पानी पर चलते हुए ईसा की ओर बढ़ा;
30 किन्तु वह प्रचण्ड वायु देख कर डर गया और जब डूबने लगा, तो चिल्ला उठा, “प्रभु! मुझे बचाइए”।
