सामान्य काल का उनतीसवाँ रविवार


📒 पहला पाठ: इसायाह 1: 15-23

15 जब तुम अपने हाथ फैलाते हो, तो मैं तुम्हारी ओर से आँख फेर लेता हूँ। मैं तुम्हारी असंख्य प्रार्थनाओं को अनसुना कर देता हूँ। तुम्हारे हाथ रक्त से रँगे हुए हैं।

16 स्नान करो, शुद्ध हो जाओ। अपने कुकर्म मेरी आँखों के सामने से दूर करो। पाप करना छोड़ दो,

17 भलाई करना सीखो। न्याय के अनुसार आचरण करो, पद्दलितों को सहायता दो, अनाथों को न्याय दिलाओ और विधवाओं की रक्षा करो।”

18 प्रभु कहता है: “आओ, हम एक साथ विचार करें। तुम्हारे पाप सिंदूर की तरह लाल क्यों न हों, वे हिम की तरह उज्जवल हो जायेंगे; वे किरमिज की तरह मटमैले क्यों न हों, वे ऊन की तरह श्वेत हो जायेंगे।

19 यदि तुम अज्ञापालन स्वीकार करोगे, तो भूमि की उपज खा कर तृप्त हो जाओगे।

20 किन्तु यदि तुम अस्वीकार कर विद्रोह करोगे, तो तलवार के घाट उतार दिये जाओगे।” यह प्रभु की वाणी है।

21 यह साध्वी नगरी कैसे वेश्या बन गयी है? जहाँ पहले न्याय और धार्मिकता का निवास था, वहाँ आज हत्यारे ही पाये जाते हैं!

22 तेरी चाँदी धातुमल बन गयी है, तेरी अंगूरी पानी से भी पतली हो गयी है।

23 तेरे शासक विद्रोही और चोरों के साथी हैं। वे उपहार पसन्द करते और रिश्वत के लोभी हैं। वे अनाथ को न्याय नहीं दिलाते और विधवाओं के मामले नहीं सुनते।


📙 दूसरा पाठ: 1 थेसेलनीकियों 1: 1-5

1 कुरिन्थ में ईश्वर की कलीसिया के नाम पौलुस, जो ईश्वर द्वारा ईसा मसीह का प्रेरित नियुक्त हुआ है, और भाई सोस्थेनेस का पत्र।

2 आप लोग ईसा मसीह द्वारा पवित्र किये गये हैं और उन सबों के साथ सन्त बनने के लिए बुलाये गये हैं, जो कहीं भी हमारे प्रभु ईसा मसीह अर्थात् अपने तथा हमारे प्रभु का नाम लेते हैं।

3 हमारा पिता ईश्वर और प्रभु ईसा मसीह आप लोगों को अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें।

4 आप लोगों को ईसा मसीह द्वारा ईश्वर का अनुग्रह प्राप्त हुआ है। इसके लिए मैं ईश्वर को निरन्तर धन्यवाद देता हूँ।

5 (5-6 मसीह का सन्देश आप लोगों के बीच इस प्रकार दृढ़ हो गया है कि आप लोग मसीह से संयुक्त होकर अभिव्यक्ति और ज्ञान के सब प्रकार के वरदानों से सम्पन्न हो गये हैं।


📘 सुसमाचार : मत्ती 22: 15-21

15 उस समय फरीसियों ने जा कर आपस में परामर्श किया कि हम किस प्रकार ईसा को उनकी अपनी बात के फन्दे में फँसायें।

16 इन्होंने ईसा के पास हेरोदियों के साथ अपने शिष्यों को यह प्रश्न पूछने भेजा, “गुरुवर! हम यह जानते हैं कि आप सत्य बोलते हैं और सच्चाई से ईश्वर के मार्ग की शिक्षा देते हैं। आप को किसी की परवाह नहीं। आप मुँह-देखी बात नहीं करते।

17 इसलिए हमें बताइए, आपका क्या विचार है- कैसर को कर देना उचित है या नहीं”

18 उनकी धूर्त्तता भाँप कर ईसा ने कहा, “ढोंगियो! मेरी परीक्षा क्यों लेते हो?

19 कर का सिक्का मुझे दिखलाओ।” जब उन्होंने एक दीनार प्रस्तुत किया,

20 तो ईसा ने उन से कहा, “यह किसका चेहरा और किसका लेख है?”

21 उन्होंने उत्तर दिया, “कैसर का”। इस पर ईसा ने उन से कहा, “तो, जो कैसर का है, उसे कैसर को दो और जो ईश्वर का है, उसे ईश्वर को”।