तैंतीसवाँ सामान्य सप्ताह
आज के संत: संत फेलिक्स (आनन्द कुमार)
📒पहला पाठ- 1 मक्काबियों 2: 15-29
15. राजा के पदाधिकारी, जो लोगों को स्वधर्मत्याग के लिए बाध्य करते थे, बलिदानों का प्रबंध करने मोदीन नामक नगर पहुँचे।
16. बहुत-से इस्राएली उन से मिल गये किन्तु मत्तथ्या और उसके पुत्र अलग रहे।
17. राजा के पदाधिकारो ने मत्तथ्या को सम्बोधित करते हुए कहा, “आप इस नगर के प्रतिष्ठित और शक्तिशाली नेता हैं। आप को अपने पुत्रों और भाइयों का समर्थन प्राप्त है।
18. आप सर्वप्रथम आगे बढ़ कर राजाज्ञा का पालन कीजिए, जैसा कि सभी राष्ट्र, यूदा के लोग और येरुसालेम के निवासी कर चुके हैं। ऐसा करने पर आपके पुत्र राजा के मित्र बनेंगे और सोना चाँदी और बहुत-से उपहारों द्वारा आपका और आपके पुत्रों का सम्मान किया जायेगा।”
19. मत्तथ्या ने पुकार कर यह उत्तर दिया, “साम्राज्य के सभी राष्ट्र भले ही राजा की बात मान जायें, सभी आपने पुरखों का धर्म छोड़ दें और राजा के आदेशों का पालन करें,
20. किन्तु मैं, मेरे पुत्र और मेरे भाई-हम अपने पुरखों के विधान के अनुसार ही चलेंगे।
21. ईश्वर हमारी रक्षा करे, जिससे हम उसकी संहिता और उसके नियमों का परित्याग न करें।
22. हम राजा की आज्ञाओं का पालन नहीं करेंगे और अपने धर्म का किसी भी प्रकार से उल्लंघन नहीं करेंगे।
23. मत्तथ्या ने इन शब्दों के तुरंत बाद एक यहूदी राजा के आदेशानुसार मोदीन की वेदी पर बलि चढ़ाने के लिए सब के देखते आगे बढ़ा।
24. इस पर मत्तथ्या का धर्मोत्साह भड़क उठा और वह आगबबूला हो गया। उसने क्रोध के आवेग में आगे झपट कर उस यहूदी को वेदी पर मार डाला।
25. उसने बलि के लिए लोगों को बाध्य करने वाले पदाधिकारी का वध किया और वेदी का विध्वंस किया।
26. इस प्रकार मत्तथ्या ने पीनहास के सदृश संहिता के प्रति अपना उत्साह प्रदर्शित किया- पीनहास ने इसी तरह सालू के पुत्र ज़िम्री का वध किया था।
27. इसके बाद मत्तथ्या ने नगर भर में घूमते हुए ऊँचे स्वर से पुकार कर यह कहा, “जो संहिता के प्रति उत्साही हैं। और विधान को बनाये रखने के पक्ष में हैं, वे मेरे पीछे चले आयें”।
28. इसके बाद वह और उसके पुत्र नगर में अपनी सारी संपत्ति छोड़ कर पहाड़ों पर भाग गये।
29. उस समय बहुत-से लोग, जिन्हें धर्म और न्याय प्रिय था, उजाड़ प्रदेश जा कर वहाँ बस गये।
📙सुसमाचार – लूकस 19:41-44
41 निकट पहुँचने पर ईसा ने शहर को देखा। वे उस पर रो पड़े
42 और बोले, “हाय! कितना अच्छा होता यदि तू भी इस शुभ दिन यह समझ पाता कि किन बातों में तेरी शान्ति है! परन्तु अभी वे बातें तेरी आँखों से छिपी हुई हैं।
43 तुझ पर वे दिन आयेंगे, जब तेरे शत्रु तेरे चारों ओर मोरचा बाँध कर तुझे घेर लेंगे, तुझ पर चारों ओर से दबाव डालेंगे,
44 तुझे और तेरे अन्दर रहने वाली तेरी प्रजा को मटियामेट कर देंगे और तुझ में एक पत्थर पर दूसरा पत्थर पड़ा नहीं रहने देंगे; क्योंकि तूने अपने प्रभु के आगमन की शुभ घड़ी को नहीं पहचाना।”