सामान्य काल
📒 पहला पाठ 2 इतिहास 19:9-11,14-21,31-36
9 उसने उनको यह आदेश दिया, ”तुम्हें प्रभु पर श्रद्धा रखते हुए ईमानदारी और निष्कपट हृदय से अपना काम करना चाहिए।
10 यदि तुम्हारे नगरों में, जहाँ तुम्हारे भाई-बन्धु रहते हैं, वे तुम्हारे यहाँ कोई मुक़दमा ले कर आयें-चाहे वह रक्तपात, संहिता, विधि-निषेधों, आदेशों या नियमों के विषय में हो- तो तुम्हें उनको समझाना चाहिए, जिससे वे प्रभु की दृष्टि में दोषी न बनें और तुम पर और तुम्हारे भाई-बन्धुओं पर उसका क्रोध नहीं भड़के। यदि तुम ऐसा ही करोगे, तो दोषी नहीं बनोगे।
11 प्रभु-सम्बन्धी सब मामलों में प्रधानयाजक अमर्या तुम्हारा अध्यक्ष होगा और सब राजकीय मामलों में इसमाएल का पुत्र जबद्या, जो यूदा के घराने का मुखिया है। लेवी लिपिक के रूप में तुम्हारी सहायता करेंगे। धैर्य से काम शुरू करो। प्रभु अच्छी तरह काम करने वाले के साथ हो।”
📘सुसमाचार :मत्ती 7:6,12-17
6 “पवित्र वस्तु कुत्तों को मत दो और अपने मोती सूअरों के सामने मत फेंको। कहीं ऐसा न हो कि वे उन्हें अपने पैरों तले कुचल दें और पलट कर तुम्हें फाड़ डालें।
12 “दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो। यही संहिता और नबियों की शिक्षा है।
13 “सँकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है।
14 किन्तु सँकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मार्ग, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।
15 “झूठे नबियों से सावधान रहो। वे भेड़ों के वेश में तुम्हारे पास आते हैं, किन्तु वे भीतर से खूँखार भेड़िये हैं।
16 उनके फलों से तुम उन्हें पहचान जाओगे। क्या लोग कँटीली झाड़ियों से अंगूर या ऊँट-कटारों से अंजीर तोड़ते हैं?
17 इस तरह हर अच्छा पेड़ अच्छे फल देता है और बुरा पेड़ बुरे फल देता है।
