उनतीसवा सामान्य सप्ताह
आज के संत: संत अन्तोनी मरियम क्लारेट

📒पहला पाठ-रोमियों 7:18-25

18 मैं जानता हूँ कि मुझ में, अर्थात मेरे दैहिक स्वभाव में थोड़ी भी भलाई नहीं; क्योंकि भलाई करने की इच्छा तो मुझ में विद्यमान है, किन्तु उसे कार्र्यान्वित करने की शक्ति नहीं है।

19 मैं जो भलाई चाहता हूँ, वह नहीं कर पाता, बल्कि मैं जो बुराई नहीं चाहता, वही कर डालता हूँ।

20 किन्तु यदि मैं वही करता हूँ जिस मैं नहीं चाहता, तो कर्ता मैं नहीं हूँ, बल्कि कर्ता है-मुझ में निवास करने वाला पाप।

21 इस प्रकार, मेरा अनुभव यह है कि जब मैं भलाई की इच्छा करता हूँ, तो बुराई ही कर पाता हूँ।

22 मेरा अन्तरतम ईश्वर के नियम पर मुग्ध है,

23 किन्तु मैं अपने शरीर में एक अन्य नियम का अनुभव करता हूँ, जो मेरे आध्यात्मिक स्वभाव से संघर्ष करता है और मुझे पाप के उस नियम के अधीन करता है, जो मेरे शरीर में विद्यमान है।

24 मैं कितना अभागा मनुष्य हूँ! इस मृत्यु के अधीन रहने वाले शरीर से मुझे कौन मुक्त करेगा?

25 ईश्वर ही! हमारे प्रभु ईसा मसीह के द्वारा। ईश्वर को धन्यवाद! इसलिए मैं अपनी बुद्धि से ईश्वर के नियम का, किन्तु अपने शरीर से पाप के नियम का पालन करता हूँ।


📙सुसमाचार – लूकस 12:54-59

54 ईसा ने लोगों से कहा, “यदि तुम पश्चिम से बादल उमड़ते देखते हो, तो तुरन्त कहते हो, ’वर्षा आ रही है‘ और ऐसा ही होता है,55 जब दक्षिण की हवा चलती है, तो कहते हो, ’लू चलेगी’ और ऐसा ही होता है।

56 ढोंगियों! यदि तुम आकाश और पृथ्वी की सूरत पहचान सकते हो, तो इस समय के लक्षण क्यों नहीं पहचानते?

57 “तुम स्वयं क्यों नहीं विचार करते कि उचित क्या है?

58 जब तुम अपने मुद्यई के साथ कचहरी जा रहे हो, तो रास्ते में ही उस से समझौता करने की चेष्टा करो। कहीं ऐसा न हो कि वह तुम्हें न्यायकर्ता के पास खींच ले जाये और न्यायकर्ता तुम्हें प्यादे के हवाले कर दे और प्यादा तुम्हें बन्दीगृह में डाल दे।

59 मैं तुम से कहता हूँ, जब तक कौड़ी-कौड़ी न चुका दोगे, तब तक वहाँ से नहीं निकल पाओगे।”