खजूर रविवार


📒पहला पाठ: इसायाह 50:4-7

4 प्रभु ने मुझे शिष्य बना कर वाणी दी है, जिससे मैं थके-माँदे लोगों को सँभाल सकूँ। वह प्रतिदिन प्रातः मेरे कान खोल देता है, जिससे मैं शिष्य की तरह सुन सकूँ।

5 प्रभु ने मेरे कान खोल दिये हैं; मैंने न तो उसका विरोध किया और न पीछे हटा।

6 मैंने मारने वालों के सामने अपनी पीठ कर दी और दाढ़ी नोचने वालों के सामने अपना गाल। मैंने अपमान करने और थूकने वालों से अपना मुख नहीं छिप़ाया।

7 प्रभु मेरी सहायता करता है; इसलिए मैं अपमान से विचलित नहीं हुआ। मैंने पत्थर की तरह अपना मुँह कड़ा कर लिया। मैं जानता हूँ कि अन्त में मुझे निराश नही होना पड़ेगा।


📙दूसरा पाठ: फ़िलिप्पियों 2:6-11

6 वह वास्तव में ईश्वर थे और उन को पूरा अधिकार था कि वह ईश्वर की बराबरी करें,

7 फिर भी उन्होंने दास का रूप धारण कर तथा मनुष्यों के समान बन कर अपने को दीन-हीन बना लिया और उन्होंने मनुष्य का रूप धारण करने के बाद

8 मरण तक, हाँ क्रूस पर मरण तक, आज्ञाकारी बन कर अपने को और भी दीन बना लिया।

9 इसलिए ईश्वर ने उन्हें महान् बनाया और उन को वह नाम प्रदान किया, जो सब नामों में श्रेष्ठ है,

10 जिससे ईसा का नाम सुन कर आकाश, पृथ्वी तथा अधोलोक के सब निवासी घुटने टेकें

11 और पिता की महिमा के लिए सब लोग यह स्वीकार करें कि ईसा मसीह प्रभु हैं।


📘सुसमाचार: मत्ती 27:11-54

11 ईसा अब राज्यपाल के सामने खड़े थे। राज्यपाल ने उन से पूछा, “क्या तुम यहूदियों के राजा हो?” ईसा ने उत्तर दिया, “आप ठीक ही कहते हैं”।

12 महायाजक और नेता उन पर अभियोग लगाते रहे, परन्तु ईसा ने कोई उत्तर नहीं दिया।

13 इस पर पिलातुस ने उन से कहा, “क्या तुम नहीं सुनते कि ये तुम पर कितने अभियोग लगा रहे हैं?”

14 फिर भी ईसा ने उत्तर में एक शब्द भी नहीं कहा। इस पर राज्यपाल को बहुत आश्चर्य हुआ।

15 पर्व के अवसर पर राज्यपाल लोगों की इच्छानुसार एक बन्दी को रिहा किया करता था।

16 उस समय बराब्बस नामक एक कुख्यात व्यक्ति बन्दीगृह में था।

17 इसलिए पिलातुस ने इकट्ठे हुए लोगों से कहा, “तुम लोग क्या चाहते हो? मैं तुम्हारे लिए किसे रिहा करूँ – बराब्बस को अथवा मसीह कहलाने वाले ईसा को?”

18 वह जानता था कि उन्होंने ईसा को ईर्ष्या से पकड़वाया है।

19 पिलातुस न्यायासन पर बैठा हुआ ही था कि उसकी पत्नी ने कहला भेजा, “उस धर्मात्मा के मामले में हाथ नहीं डालना, क्योंकि उसी के कारण मुझे आज स्वप्न में बहुत कष्ट हुआ”।

20 इसी बीच महायाजकों और नेताओं ने लोगों को यह समझाया कि वे बराब्बस को छुड़ायें और ईसा का सर्वनाश करें।

21 राज्यपाल ने फिर उन से पूछा, “तुम लोग क्या चाहते हो? दोनों में किसे तुम्हारे लिए रिहा करूँ?” उन्होंने उत्तर दिया, “बराब्बस को”।

22 इस पर पिलातुस ने उन से कहा, “तो, मैं ईसा का क्या करूँ, जो मसीह कहलाते हैं?” सब ने उत्तर दिया, “इसे क्रूस दिया जाये”।

23 पिलातुस ने पूछा, “क्यों? इसने कौन-सा अपराध किया?” किन्तु वे और भी ज़ोर से चिल्ला उठे, “इसे क्रूस दिया जाये!”

24 जब पिलातुस ने देखा कि मेरी एक भी नहीं चलती, उलटे हंगामा होता जा रहा है, तो उसने पानी मँगा कर लोगों के सामने हाथ धोये और कहा, “मैं इस धर्मात्मा के रक्त का दोषी नहीं हूँ। तुम लोग जानो”

25 और सारी जनता ने उत्तर दिया, “इसका रक्त हम पर और हमारी सन्तान पर!”

26 इस पर पिलातुस ने उनके लिए बराब्बस को मुक्त कर दिया और ईसा को कोड़े लगवा कर क्रूस पर चढ़ाने सैनिकों के हवाले कर दिया।

27 इसके बाद राज्यपाल के सैनिकों ने ईसा को भवन के अन्दर ले जा कर उनके पास सारी पलटन एकत्र कर ली।

28 उन्होंने उनके कपडे़ उतार कर उन्हें लाल चोग़ा पहनाया,

29 काँटों का मुकुट गूँथ कर उनके सिर पर रखा और उनके दाहिने हाथ में सरकण्डा थमा दिया। तब उनके सामने घुटने टेक कर उन्होंने यह कहते हुए उनका उपहास किया, “यहूदियों के राजा, प्रणाम!”

30 वे उन पर थूकते और सरकण्डा छीन कर उनके सिर पर मारते थे।

31 इस प्रकार उनका उपहास करने के बाद, वे चोग़ा उतार कर और उन्हें उनके निजी कपड़े पहना कर, क्रूस पर चढ़ाने ले चले।

32 शहर से निकलते समय उन्हें कुरेने-निवासी सिमोन मिला और उन्होंने उसे ईसा का क्रूस उठा ले चलने के लिए बाध्य किया।

33 वे उस जगह पहुँचे, जो गोलगोथा अर्थात् खोपड़ी की जगह कहलाती है।

34 वहाँ लोगों ने ईसा को पित्त मिली हुई अंगूरी पीने को दी। उन्होंने उसे चख तो लिया, लेकिन उसे पीना अस्वीकार किया।

35 उन्होंने ईसा को क्रूस पर चढ़ाया और चिट्ठी डाल कर उनके कपडे़ बाँट लिये।

36 इसके बाद वे उन पर पहरा देने बैठे।

37 ईसा के सिर के ऊपर दोषपत्र लटका दिया गया। वह इस प्रकार था- यह यहूदियों का राजा ईसा है।

38 ईसा के साथ ही उन्होंने दो डाकुओं को क्रूस पर चढ़ाया- एक को उनके दायें और दूसरे को उनके बायें।

39 उधर से आने-जाने वाले लोग ईसा की निन्दा करते और सिर हिलाते हुए

40 यह कहते थे, “ऐ मन्दिर ढाने वाले और तीन दिनों के अन्दर उसे फिर बना देने वाले! यदि तू ईश्वर का पुत्र है, तो क्रूस से उतर आ”।

41 इसी तरह शास्त्रियों और नेताओं के साथ महायाजक भी यह कहते हुए उनका उपहास करते थे,

42 “इसने दूसरों को बचाया, किन्तु यह अपने को नहीं बचा सकता। यह तो इस्राएल का राजा है। अब यह क्रूस से उतरे, तो हम इस में विश्वास करेंगे।

43 इसे ईश्वर का भरोसा था। यदि ईश्वर इस पर प्रसन्न हो, तो इसे छुड़ाये। इसने तो कहा है- मैं ईश्वर का पुत्र हूँ।”

44 जो डाकू ईसा के साथ क्रूस पर चढ़ाये गये थे, वे भी इसी तरह उनका उपहास करते थे।

45 दोपहर से तीसरे पहर तक पूरे प्रदेश पर अँधेरा छाया रहा।

46 लगभग तीसरे पहर ईसा ने उँचे स्वर से पुकारा, “एली! एली! लेमा सबाखतानी?” इसका अर्थ है- मेरे ईश्वर! मेरे ईश्वर! तूने मुझे क्यों त्याग दिया है?

47 यह सुन कर पास खडे़ लोगों में से कुछ कहते थे, “यह एलियस को बुला रहा है।”

48 उन में से एक तुरन्त दौड़ कर पनसोख्ता ले आया और उसे खट्टी अंगूरी में डुबा कर और सरकण्डे में लगा कर उसने ईसा को पीने को दिया।

49 कुछ लोगों ने कहा, “रहने दो! देखें,  एलियस इसे बचाने आता है या नहीं”।

50 तब ईसा ने फिर ऊँचे स्वर से पुकार कर प्राण त्याग दिये।

51 उसी समय मन्दिर का परदा ऊपर से नीचे तक फट कर दो टुकड़े हो गया, पृथ्वी काँप उठी, चट्टानें फट गयीं,

52 कब्रें खुल गयीं और बहुत-से मृत सन्तों के शरीर पुनर्जीवित हो गये।

53 वे ईसा के पुनरुत्थान के बाद क़ब्रों से निकले और पवित्र नगर जा कर बहुतों को दिखाई दिये।

54 शतपति और उसके साथ ईसा पर पहरा देने वाले सैनिक भूकम्प और इन सब घटनाओं को देख कर अत्यन्त भयभीत हो गये और बोल उठे, “निश्चय ही, यह ईश्वर का पुत्र था”।