चौंतीसवाँ सामान्य सप्ताह
आज के संत: संत ह्यूबर्ट


📒पहला पाठ- दानिएल 7: 15-27

15 मैं बहुत व्याकुल हो उठा और अपने मन के दृश्यों के कारण विस्मित हो गया।

16 मैंने वहाँ उपस्थित लोगों में से एक के पास जा कर पूछा कि इन सब बातों का अर्थ क्या है और उसने मुझे समझाते हुए कहा,

17 “ये चार विशालकय पशु चार राज्य हैं, जो पृथ्वी पर प्रकट होंगे,

18 किन्तु सर्वोच्य प्रभु के संतों को जो राजत्व दिया जायेगा, वह अनन्त काल तक बना रहेगा।”

19 तब मैंने जानना चाहा कि उस चैथे पशु का अर्थ क्या है, जो सभी पहले पशुओं से भिन्न था, जो बहुत डरावना था, जो चबाता और खाता जाता था और जो कुछ रह जाता, उसे पैरों तले रौंदता था।

20 मैंने उसके सिर के दस सींगों के विषय में जानना चाहा और उस अन्य सींग के विषय में भी, जिसके निकलने पर तीन सींग उखड़ गये- उस सींग के विषय में, जिसकी आंखे थी, जिसका एक डींग मारने वाला मुँह था और जो दूसरे सींगों से अधिक बडा दिखता था।

21 मैं देख ही रहा था कि वह सींग संतों से युद्ध कर रहा था और वयोवृद्ध व्यक्ति के आने तक उन पर प्रबल हो रहा था।

22 उसने सर्वोच्य प्रभु के संतों को न्याय दिलाया और वह समय आया, जब संतों ने राज्य पर अधिकार प्राप्त कर लिया।

23 उसने मुझे यह उत्तर दिया, “चैथा पशु पृथ्वी पर प्रकट होने वाला चैथा राज्य है। वह अन्य सब राज्यों से भिन्न होगा। वह समस्त पृृथ्वी को खा जायेगा और पैरों तले रौंद कर चूर-चूर कर देगा।

24 वे दस सींग इस राज्य के दस राजा हैं। उनके बाद एक ऐसे राजा का उदय होगा, जो पहले के राजाओं से भिन्न होगा और तीन राजाओं को परास्त कर देगा।

25 वह सर्वोच्य प्रभु के विरुद्ध बोलेगा, सर्वोच्य प्रभु के संतों पर अत्याचार करेगा और पर्वों और प्रथाओं में परिवर्तन लाने की योजना तैयार करेगा। संत साढे तीन वर्ष तक उसके हाथ में दिये जायेंगे।

26 इसके बाद न्याय की कार्यवाही प्रारंभ होगी। राजत्व उस से छीन लिया जायेगा और सदा के लिए उसका सर्वनाश किया जायेगा।

27 तब पृथ्वी भर के सब राज्यों का अधिकार, प्रभुत्व और वैभाव सर्वोच्च प्रभु के संतों की प्रजा को प्रदान किया जायेगा। उसका राज्य सदा बना रहेगा और सभी राष्ट्र उसकी सेवा करेंगे और उसके अधीन रहेंगे।”


📙सुसमाचार – लूकस 21: 34-36

34 “सावधान रहो। कहीं ऐसा न हो कि भोग-विलास, नशे और इस संसार की चिन्ताओं से तुम्हारा मन कुण्ठित हो जाये और वह दिन फन्दे की तरह अचानक तुम पर आ गिरे;

35 क्योंकि वह दिन समस्त पृथ्वी के सभी निवासियों पर आ पड़ेगा।

36 इसलिए जागते रहो और सब समय प्रार्थना करते रहो, जिससे तुम इन सब आने वाले संकटों से बचने और भरोसे के साथ मानव पुत्र के सामने खड़े होने योग्य बन जाओ।”

37 ईसा दिन में मन्दिर में शिक्षा देते थे, परन्तु वह शहर के बाहर निकल कर जैतून पहाड़ पर रात बिताते थे

38 और सब लोग उनका उपदेश सुनने सबेरे मन्दिर आ जाते थे।