संत जॉन मैरी वियान्नी, पुरोहित

📒 पहला पाठ:यिरमियाह 30: 1-2, 12-15, 18-22

1 प्रभु की वाणी यिरमियाह को यह कहते हुए सुनाई पड़ीः

2 इस्राएल का प्रभु-ईश्वर यह कहता है – ’मैंने जो कुछ तुम से कहा, वह सब एक पुस्तक में लिख लो ;

12 “प्रभु यह कहता है- तुम्हारी बीमारी कभी अच्छी नहीं होगी। तुम्हारे घावों पर कोई इलाज नहीं है।

13 तुम्हारा कोई पक्षधर नहीं है। तुम्हारे घाव नहीं भरेंगे।

14 तुम्हारे सभी प्रेमियों ने तुम को भुला दिया; वे तुम्हारी कोई परवाह नहीं करते, क्योंकि तुम्हारे असंख्य अपराधों और पापों के कारण मैंने तुम को शत्रु की तरह मारा और घोर दण्ड दिया है।

15 तुम अपने घावों पर क्यों रोती हो? तुम्हारी बीमारी का कोई इलाज नहीं। तुम्हारे असंख्य अपराधों और पापों के कारण ही मैंने तुम्हारे साथ ऐसा व्यवहार किया है।

18 “प्रभु यह कहता है- मैं याकूब के तम्बुओं को फिर खड़ा करूँगा। मैं उसके घरों पर दया करूँगा। खँडहरों पर नगर का पुननिर्माण होगा और अपने पुराने स्थान पर गढ़ का पुनरुद्धार होगा।

19 उन में से स्तुतिगान और आनन्दोत्सव की ध्वनि सुनाई देगी। मैं उनकी संख्या बढ़ाऊँगा, वह फिर कभी नहीं घटेगी। मैं उन्हें सम्मान प्रदान करूँगा, उनका फिर कभी तिरस्कार नहीं किया जायेगा।

20 उनकी सन्तति पहले-जैसी होगी और उनका समुदाय मेरे सामने बना रहेगा। मैं उनके सब अत्याचारियों को दण्ड दूँगा।

21 उन में से एक उनका शासक बनेगा और उनके बीच में से उनका राजा उत्पन्न होगा। मैं स्वयं उसे अपने पास बुलाऊँगा और वह मेरे पास आयेगा; क्योंकि कोई भी अपने आप मेरे पास आने का साहस नहीं करता। यह प्रभु की वाणी है।

22 तुम मेरी प्रजा होगे और मैं तुम्हारा ईश्वर होऊँगा।“


📘 सुसमाचार:15: 1-2, 10-14

1 येरुसालेम के कुछ फ़रीसी और शास्त्री किसी दिन ईसा के पास आये

2 और यह बोले, “आपके शिष्य पुरखों की परम्परा क्यों तोड़ते हैं? वे तो बिना हाथ धोये रोटी खाते हैं।”

10 इसके बाद ईसा ने लोगों को पास बुला कर कहा, “तुम लोग मेरी बात सुनो और समझो।

11 जो मुँह में आता है, वह मनुष्य को अशुद्ध नहीं करता है; बल्कि जो मुँह से निकलता है, वही मनुष्य को अशुद्ध करता है।”

12 बाद में शिष्य आ कर ईसा से बोले, “क्या आप जानते हैं कि फ़रीसी आपकी बात सुन कर बहुत बुरा मान गये हैं?”

13 ईसा ने उत्तर दिया, “जो पौधा मेरे स्वर्गिक पिता ने नहीं रोपा है, वह उखाड़ा जायेगा।

14 उन्हें रहने दो; वे अन्धों के अन्धे पथप्रदर्शक हैं। यदि अन्धा अन्धे को ले चले, तो दोनों ही गड्ढे में गिर जायेंगे।”