आज के संत: तिमथी और तीतुस, बिशप

📒पहला पाठ: 2 तिमथी 1 : 1-8 या , तितुस 1: 1-5

1 यह पत्र प्रिय पुत्र तिमथी के नाम पौलुस की ओर से है, जिसे ईश्वर ने इस बात का प्रचार करने के लिए ईसा मसीह का प्रेरित चुना है कि उसने हमें जीवन प्रदान करने की जो प्रतिज्ञा की थी, वह ईसा में पूरी हो गयी है।

2 पिता-परमेश्वर और हमारे प्रभु ईसा मसीह तुम्हें कृपा, दया तथा शान्ति प्रदान करें!

3 मैं अपने पूर्वजों की तरह शुद्ध अन्तःकरण से ईश्वर की सेवा करता हूँ और उसे धन्यवाद देता हुआ निरन्तर दिन-रात तुम्हें अपनी प्रार्थनाओं में याद करता हूँ।

4 जब मुझे तुम्हारे आँसुओं का स्मरण आता है, तो तुम से फिर मिलने की तीव्र अभिलाषा होती है, जिससे मेरा आनन्द परिपूर्ण हो जाये।

5 तब मुझे तुम्हारा निष्कपट विश्वास सहज ही याद आता है। वह विश्वास पहले तुम्हारी नानी लोइस तथा तुम्हारी माता यूनीके में विद्यमान था और मुझे विश्वास है, अब तुम में भी विद्यमान है।

6 मैं तुम से अनुरोध करता हूँ कि तुम ईश्वरीय वरदान की वह ज्वाला प्रज्वलित बनाये रखो, जो मेरे हाथों के आरोपण से तुम में विद्यमान है।

7 ईश्वर ने हमें भीरुता का नहीं, बल्कि सामर्थ्य, प्रेम तथा आत्मसंयम का मनोभाव प्रदान किया।

8 तुम न तो हमारे प्रभु का साक्ष्य देने में लज्जा अनुभव करो और न मुझ से, जो उनके लिए बन्दी हूँ, बल्कि ईश्वर के सामर्थ्य पर भरोसा रख कर तुम मेरे साथ सुसमाचार के लिए कष्ट सहते रहो।

अथवा

1 यह पत्र, एक ही विश्वास में सहभागिता के नाते सच्चे पुत्र तीतुस के नाम, पौलुस की ओर से है, जो ईश्वर का सेवक तथा ईसा मसीह का प्रेरित है,

2 ताकि वह ईश्वर के कृपापात्रों को विश्वास, सच्ची भक्ति का ज्ञान और अनन्त जीवन की आशा दिलाये। सत्यवादी ईश्वर ने अनादि काल से इस जीवन की प्रतिज्ञा की थी।

3 अब, उपयुक्त समय में, इसका अभिप्राय उस सन्देश द्वारा स्पष्ट कर दिया गया है, जिसका प्रचार मुक्तिदाता ईश्वर ने मुझे सौंपा है।

4 पिता-परमेश्वर और हमारे मुक्तिदाता ईसा मसीह तुम्हें अनुग्रह तथा शान्ति प्रदान करें!

5 मैंने तुम्हें इसलिए क्रेत में रहने दिया कि तुम वहाँ कलीसिया का संगठन पूरा कर दो और मेरे अनुदेश के अनुसार प्रत्येक नगर में अधिकारियों को नियुक्त करो।

📘सुसमाचार : मारकुस 3: 22-30

22  येरुसालेम से आये हुए शास्त्री कहते थे, “उसे बेलजे़बुल सिद्ध है” और “वह नरकदूतों के नायक की सहायता से नरकदूतों को निकालता है”।

23 ईसा ने उन्हें अपने पास बुला कर यह दृष्टान्त सुनाया, “शैतान शैतान को कैसे निकाल सकता है?

24 यदि किसी राज्य में फूट पड़ गयी हो, तो वह राज्य टिक नहीं सकता।

25 यदि किसी घर में फूट पड़ गयी हो, तो वह घर टिक नहीं सकता।

26 और यदि शैतान अपने ही विरुद्ध विद्रोह करे और उसके यहाँ फूट पड़ गयी हो, तो वह टिक नहीं सकता, और उसका सर्वनाश हो गया है।

27 “कोई किसी बलवान् के घर में घुस कर उसका सामान तब तक नहीं लूट सकता, जब तक कि वह उस बलवान् को न बाँध ले। इसके बाद ही वह उसका घर लूट सकता है।

28 “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ – मनुष्य चाहे जो भी पाप या ईश-निन्दा करें, उन्हें सब की क्षमा मिल जायेगी;

29 परन्तु पवित्र आत्मा की निन्दा करने वाले को कभी भी क्षमा नहीं मिलेगी। वह अनन्त पाप का भागी है।”

30 उन्होंने यह इसीलिए कहा कि कुछ लोग कहते थे, “उसे अपदूत सिद्ध है”।