आज की संत: लूर्द की पवित्र माता मरियम

📒 पहला पाठ: 1 राजाओं 10: 1-10

1 शेबा की रानी ने सुलेमान की कीर्ति के विषय में सुना था और वह पहेलियों द्वारा उसकी परीक्षा लेने आयी।

2 वह ऊँटों की लम्बी कतार के साथ येरूसालेम पहुँची, जिन पर सुगन्धित द्रव्य, बहुत-सा सोना और बहुमूल्य रत्न लदे हुए थे। वह सुलेमान के यहाँ अन्दर आयी और उसके मन में जो कुछ था, उसने वह सब सुलेमान को बताया।

3 सुलेमान ने उसके सभी प्रश्नों का उत्तर दिया- उन में एक भी ऐसा नहीं निकला, जिसका सुलेमान सन्तोषजनक उत्तर नहीं दे सका।

4 जब शेबा की रानी ने सुलेमान की समस्त प्रज्ञा, उसके द्वारा निर्मित भवन,

5 उसकी मेज़ के भोजन, उसके साथ खाने वाले दरबारियों, उसके सेवकों की परिचर्या और परिधान, उसके मदिरा पिलाने वालों और प्रभु के मन्दिर में उसके द्वारा चढ़ायी हुई होम-बलियों को देखा, तो उसके होश उड़ गये

6 और उसने राजा से यह कहा, “मैने अपने देश में आपके और आपकी प्रज्ञा के विषय में जो चरचा सुनी थी, वह सच है।

7 जब तक मैंने आ कर अपनी आँखों से नहीं देखा, तब तक मुझे उस पर विश्वास नहीं था। सच पूछिए, तो मुझे आधा भी नहीं बताया गया था। मैंने जो चरचा सुनी थी, उसकी अपेक्षा आपकी प्रज्ञा और आपका वैभव कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

8 धन्य है आपकी प्रजा और धन्य हैं आपके सेवक, जो आपके सामने उपस्थित रह कर आपकी विवेकपूर्ण बातें सुनते रहते हैं!

9 धन्य है प्रभु, आपका ईश्वर, जिसने आप पर प्रसन्न होकर आप को इस्राएल के सिंहासन पर बैठाया! इस्राएल के प्रति उसका प्रेम चिरस्थायी है, इसलिए उसने न्याय और धार्मिकता बनाये रखने के लिए आप को राजा के रूप में नियुक्त किया है।”

10 उसने राजा को एक सौ बीस मन सोना, बहुत अधिक सुगन्धित द्रव्य और बहुमूल्य रत्न प्रदान किये। शेबा की रानी ने जितना सुगन्धित द्रव्य सुलेमान को दिया, उतना फिर कभी नहीं लाया गया।


📘 सुसमाचार: मारकुस 7: 14-23

14 ईसा ने बाद में लोगों को फिर अपने पास बुलाया और कहा, “तुम लोग, सब-के-सब, मेरी बात सुनो और समझो।

15 ऐसा कुछ भी नहीं है, जो बाहर से मनुष्य में प्रवेश कर उसे अशुद्ध कर सके; बल्कि जो मनुष्य में से निकलता है, वही उसे अशुद्ध करता है।

16 जिसके सुनने के कान हों, वह सुन ले!

17 जब ईसा लोगों को छोड़ कर घर आ गये थे, तो उनके शिष्यों ने इस दृष्टान्त का अर्थ पूछा

18 ईसा ने कहा, “क्या तुम लोग भी इतने नासमझ हो? क्या तुम यह नहीं समझते कि जो कुछ बाहर से मनुष्य में प्रवेश करता है, वह उसे अशुद्ध नहीं कर सकता?

19 क्योंकि वह तो उसके मन में नहीं, बल्कि उसके पेट में चला जाता है और शौचघर में निकलता है।” इस तरह वह सब खाद्य पदार्थ शुद्ध ठहराते थे।

20 ईसा ने फिर कहा, “जो मनुष्य में से निकलता है, वही उसे अशुद्ध करता है।

21 क्योंकि बुरे विचार भीतर से, अर्थात् मनुष्य के मन से निकलते हैं। व्यभिचार, चोरी, हत्या,

22 परगमन, लोभ, विद्वेष, छल-कपट, लम्पटता, ईर्ष्या, झूठी निन्दा, अहंकार और मूर्खता-

23 ये सब बुराइयाँ भीतर से निकलती है और मनुष्य को अशुद्ध करती हैं।