पवित्र शनिवार
📒पहला पाठ:उत्पत्ति 1:1-31,2:1-2
प्रारम्भ में ईश्वर ने स्वर्ग और पृथ्वी की सृष्टि की।
2 पृथ्वी उजाड़ और सुनसान थी। अथाह गर्त्त पर अन्धकार छाया हुआ था और ईश्वर का आत्मा सागर पर विचरता था।
3 ईश्वर ने कहा, ”प्रकाश हो जाये”, और प्रकाश हो गया।
4 ईश्वर को प्रकाश अच्छा लगा और उसने प्रकाश और अन्धकार को अलग कर दिया।
5 ईश्वर ने प्रकाश का नाम ‘दिन’ रखा और अन्धकार का नाम ‘रात’। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ – यह पहला दिन था।
6 ईश्वर ने कहा, ”पानी के बीच एक छत बन जाये, जो पानी को पानी से अलग कर दे”, और ऐसा ही हुआ।
7 ईश्वर ने एक छत बनायी और नीचे का पानी और ऊपर का पानी अलग कर दिया।
8 ईश्वर ने छत का नाम ‘आकाश’ रखा। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ – यह दूसरा दिन था।
9 ईश्वर ने कहा, ”आकाश के नीचे का पानी एक ही जगह इक्कट्ठा हो जाये और थल दिखाई पड़े”, और ऐसा ही हुआ।
10 ईश्वर ने थल का नाम ‘पृथ्वी’ रखा और जल-समूह का नाम ‘समुद्र’। और यह ईश्वर को अच्छा लगा।
11 ईश्वर ने कहा, ”पृथ्वी पर हरियाली लहलहाये, बीजदार पौधे और फलदार पेड़ उत्पन्न हो जायें, जो अपनी-अपनी जाति के अनुसार बीजदार फल लायें”, और ऐसा ही हुआ।
12 पृथ्वी पर हरियाली उगने लगी : अपनी-अपनी जाति के अनुसार बीज पैदा करने वाले पौधे और बीजदार फल देने वाले पेड़। और यह ईश्वर को अच्छा लगा।
13 सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ- यह तीसरा दिन था।
14 ईश्वर ने कहा, ”दिन और रात को अलग कर देने के लिए आकाश में नक्षत्र हों। उनके सहारे पर्व निर्धारित किये जायें और दिनों तथा वर्षों की गिनती हो।
15 वे पृथ्वी को प्रकाश देने के लिए आकाश में जगमगाते रहें।” और ऐसा ही हुआ।
16 ईश्वर ने दो प्रधान नक्षत्र बनाये, दिन के लिए एक बड़ा और रात के लिए एक छोटा; साथ-साथ तारे भी।
17 ईश्वर ने उन को आकाश में रख दिया, जिससे वे पृथ्वी को प्रकाश दें,
18 दिन और रात का नियंत्रण करें और प्रकाश तथा अन्धकार को अलग कर दें और यह ईश्वर को अच्छा लगा।
19 सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ – यह चौथा दिन था।
20 ईश्वर ने कहा, ”पानी जीव-जन्तुओं से भर जाये और आकाश के नीचे पृथ्वी के पक्षी उड़ने लगें”।
21 ईश्वर ने मकर और नाना प्रकार के जीव-जन्तुओं की सृष्टि की, जो पानी में भरे हुए हैं और उसने नाना प्रकार के पक्षियों की भी सृष्टि की। और यह ईश्वर को अच्छा लगा।
22 ईश्वर ने उन्हें यह आशीर्वाद दिया, ”फलो-फूलो। समुद्र के पानी में भर जाओ और पृथ्वी पर पक्षियों की संख्या बढ़ती जाये”।
23 सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ- यह पाँचवाँ दिन था।
24 ईश्वर ने कहा, ”पृथ्वी नाना प्रकार के घरेलू, ज़मीन पर रेंगने वाले और जंगली जीव-जन्तुओं को पैदा करे”, और ऐसा ही हुआ।
25 ईश्वर ने नाना प्रकार के जंगली, घरेलू और ज़मीन पर रेंगने वाले जीव-जन्तुओं को बनाया और यह ईश्वर को अच्छा लगा।
26 ईश्वर ने कहा, ”हम मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनायें, वह हमारे सदृश हो। वह समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों घरेलू और जंगली जानवरों और ज़मीन पर रेंगने वाले सब जीव-जन्तुओं पर शासन करे।”
27 ईश्वर ने मनुष्य को अपना प्रतिरूप बनाया; उसने उसे ईश्वर का प्रतिरूप बनाया; उसने नर और नारी के रूप में उनकी सृष्टि की।
28 ईश्वर ने यह कह कर उन्हें आशीर्वाद दिया, ”फलो-फूलो। पृथ्वी पर फैल जाओ और उसे अपने अधीन कर लो। समुद्र की मछलियों, आकाश के पक्षियों और पृथ्वी पर विचरने वाले सब जीव-जन्तुओं पर शासन करो।”
29 ईश्वर ने कहा, “मैं तुम को पृथ्वी भर के बीज पैदा करने वाले सब पौधे और बीजदार फल देने वाले सब पेड़ देता हूँ। वह तुम्हारा भोजन होगा। मैं सब जंगली जानवरों को, आकाश के सब पक्षियों को,
30 पृथ्वी पर विचरने वाले जीव-जन्तुओं को उनके भोजन के लिए पौधों की हरियाली देता हूँ” और ऐसा ही हुआ।
31 ईश्वर ने अपने द्वारा बनाया हुआ सब कुछ देखा और यह उस को अच्छा लगा। सन्ध्या हुई और फिर भोर हुआ- यह छठा दिन था।
1 इस प्रकार आकाश तथा पृथ्वी और जो कुछ उन में है, सब की सृष्टि पूरी हुई।
2 सातवें दिन ईश्वर का किया हुआ कार्य समाप्त हुआ। उसने अपना समस्त कार्य समाप्त कर, सातवें दिन विश्राम किया।
📙दूसरा पाठ: उत्पत्ति 22:1-18
1 ईश्वर ने इब्राहीम की परीक्षा ली। उसने उस से कहा, ”इब्राहीम! इब्राहीम!” इब्राहीम ने उत्तर दिया, ”प्रस्तुत हूँ।”
2 ईश्वर ने कहा, ”अपने पुत्र को, अपने एकलौते को, परमप्रिय इसहाक को साथ ले जा कर मोरिया देश जाओ। वहाँ, जिस पहाड़ पर मैं तुम्हें बताऊँगा, उसे बलि चढ़ा देना।”
3 इब्राहीम बड़े सबेरे उठा। उसने अपने गधे पर ज़ीन बाँध कर दो नौकरों और अपने पुत्र इसहाक को बुला भेजा। उसने होम-बली के लिए लकड़ी तैयार कर ली और उस जगह के लिए प्रस्थान किया, जिसे ईश्वर ने बताया था।
4 तीसरे दिन, इब्राहीम ने आँखें ऊपर उठायीं और उस जगह को दूर से देखा।
5 इब्राहीम ने अपने नौकरों से कहा, ”तुम लोग गधे के साथ यहाँ ठहरो। मैं लड़के के साथ वहाँ जाऊँगा। आराधना करने के बाद हम तुम्हारे पास लौट आयेंगे।”
6 इब्राहीम ने होम-बलि की लकड़ी अपने पुत्र इसहाक पर लाद दी। उसने स्वयं आग और छुरा हाथ में ले लिया और दोनों साथ-साथ चल दिये।
7 इसहाक ने अपने पिता इब्राहीम से कहा, ”पिताजी!” उसने उत्तर दिया, ”बेटा! क्या बात है?” उसने उत्तर दिया, ”देखिए, आग और लकड़ी तो हमारे पास है; किन्तु होम का मेमना कहाँ है?”
8 इब्राहीम ने उत्तर दिया, ”बेटा! ईश्वर होम के मेमने का प्रबन्ध कर देगा”, और वे दोनों साथ-साथ आगे बढ़े।
9 जब वे उस जगह पहुँच गये, जिसे ईश्वर ने बताया था, तो इब्राहीम ने वहाँ एक वेदी बना ली और उस पर लकड़ी सजायी। इसके बाद उसने अपने पुत्र इसहाक को बाँधा और उसे वेदी के ऊपर रख दिया।
10 तब इब्राहीम ने अपने पुत्र को बलि चढ़ाने के लिए हाथ बढ़ा कर छुरा उठा लिया।
11 किन्तु प्रभु का दूत स्वर्ग से उसे पुकार कर बोला, ”इब्राहीम! ”इब्राहीम! उसने उत्तर दिया, ”प्रस्तुत हूँ।”
12 दूत ने कहा, ”बालक पर हाथ नहीं उठाना; उसे कोई हानि नहीं पहुँचाना। अब मैं जान गया कि तुम ईश्वर पर श्रद्धा रखते हो – तुमने मुझे अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी देने से इनकार नहीं किया।”
13 इब्राहीम ने आँखें ऊपर उठायीं और सींगों से झाड़ी में फँसे हुए एक मेढ़े को देखा। इब्राहीम ने जा कर मेढ़े को पकड़ लिया और उसे अपने पुत्र के बदले बलि चढ़ा दिया।
14 इब्राहीम ने उस जगह का नाम ‘प्रभु का प्रबन्ध’ रखा; इसलिए लोग आजकल कहते हैं, ”प्रभु पर्वत पर प्रबन्ध करता है।”
15 ईश्वर का दूत इब्राहीम को दूसरी बार पुकार कर
16 बोला, ”यह प्रभु की वाणी है। मैं शपथ खा कर कहता हूँ – तुमने यह काम किया : तुमने मुझे अपने पुत्र, अपने एकलौते पुत्र को भी देने से इनकार नहीं किया;
17 इसलिए मैं तुम पर आशिष बरसाता रहूँगा। मैं आकाश के तारों और समुद्र के बालू की तरह तुम्हारे वंशजों को असंख्य बना दूँगा और वे अपने शत्रुओं के नगरों पर अधिकार कर लेंगे।
18 तुमने मेरी आज्ञा का पालन किया है; इसलिए तुम्हारे वंश के द्वारा पृथ्वी के सभी राष्ट्रों का कल्याण होगा।”
📘सुसमाचार: मत्ती 28:1-10
1 विश्राम-दिवस के बाद, सप्ताह के प्रथम दिन, पौ फटते ही, मरियम मगदलेना और दूसरी मरियम क़ब्र देखने आयीं।
2 एकाएक भारी भूकम्प हुआ। प्रभु का एक दूत स्वर्ग से उतरा, क़ब्र के पास आया और पत्थर अलग लुढ़का कर उस पर बैठ गया।
3 उसका मुखमण्डल बिजली की तरह चमक रहा था और उसके वस्त्र हिम के सामान उज्ज्वल थे।
4 दूत को देख कर पहरेदार थर-थर काँपने लगे और मृतक-जैसे हो गये।
5 स्वर्गदूत ने स्त्रियों से कहा, “डरिए नहीं। मैं जानता हूँ कि आप लोग ईसा को ढूँढ़ रही हैं, जो क्रूस पर चढ़ाये गये थे।
6 वे यहाँ नहीं हैं। वे जी उठे हैं, जैसा कि उन्होंने कहा था। आइए और वह जगह देख लीजिए, जहाँ वे रखे गये थे।
7 अब सीधे उनके शिष्यों के पास जा कर कहिए, ‘वे मृतकों में से जी उठे हैं। वह आप लोगों से पहले गलीलिया जायेंगे, वहाँ आप लोग उनके दर्शन करेंगे’। यही आप लोगों के लिए मेरा सन्देश है।”
8 स्त्रियाँ शीघ्र ही क़ब्र के पास से चली गयीं और विस्मय तथा आनन्द के साथ उनके शिष्यों को यह समाचार सुनाने दौड़ीं।
9 ईसा एकाएक मार्ग में स्त्रियों के सामने आ कर खड़े हो गये और उन्हें नमस्कार किया। वे आगे बढ़ आयीं और उन्हें दण्डवत् कर उनके चरणों से लिपट गयीं।
10 ईसा ने उनसे कहा, “डरो नहीं। जाओ और मेरे भाइयों को यह सन्देश दो कि वे गलीलिया जायें। वहाँ वे मेरे दर्शन करेंगे।”