सामान्य सप्ताह
📒पहला पाठ:2 तिमथी 3:10-17
10 तुम मेरी शिक्षा, आचरण, उद्देश्य, विश्वास, सहनशीलता, प्रेम और धैर्य से अच्छी तरह परिचित हो।
11 तुम जानते हो कि अन्ताखि़या, इकोनियुम और लुस्त्रा में मुझ पर क्या-क्या अत्याचार हुए और मुझे कितना सताया गया। मैंने कितने अत्याचार सहे! किन्तु ईश्वर सब में मेरी रक्षा करता रहा है।
12 वास्तव में जो लोग मसीह के शिष्य बन कर भक्तिपूर्वक जीवन बिताना चाहेंगे, उन सबों को अत्याचार सहना ही पड़ेगा।
13 किन्तु पापी और धूर्त लोग दूसरों को और अपने को धोखा देते हुए बदतर होते जायेंगे।
14 तुम्हें जो शिक्षा मिली है और तुमने जिस में विश्वास किया है, उस पर आचरण करते रहो। याद रखो कि तुम्हें किन लोगों से यह शिक्षा मिली थी और
15 यह कि तुम बचपन से धर्मग्रन्थ जानते हो। धर्मग्रन्थ तुम्हें उस मुक्ति का ज्ञान दे सकता है, जो ईसा मसीह में विश्वास करने से प्राप्त होती है।
16 पूरा धर्मग्रन्थ ईश्वर की प्रेरणा से लिखा गया है। वह शिक्षा देने के लिए, भ्रान्त धारणाओं का खण्डन करने के लिए, जीवन के सुधार के लिए और सदाचरण का प्रशिक्षण देने के लिए उपयोगी है।
17 जिससे ईश्वर-भक्त सुयोग्य और हर प्रकार के सत्कार्य के लिए उपयुक्त बन जाये।
📘सुसमाचार:मारकुस 12:35-37
35 ईसा ने, मन्दिर में शिक्षा देते समय, यह प्रश्न उठाया, “शास्त्री लोग कैसे कह सकते हैं कि मसीह दाऊद के पुत्र हैं?
36 दाऊद ने स्वयं पवित्र आत्मा की प्रेरणा से कहा- प्रभु ने मेरे प्रभु से कहा, तुम तब तक मेरे दाहिने बैठे रहो, जब तक मैं तुम्हारे शत्रुओं को तुम्हारे पैरों तले न डाल दूँ।
37 दाऊद स्वयं उन्हें प्रभु कहते हैं, तो वह उनके पुत्र कैसे हो सकते हैं?” एक विशाल जन समूह बड़ी रुचि से ईसा की बातें सुन रहा था।
