पवित्र संरक्षक स्वर्गदूत
📒 पहला पाठ: अय्यूब 38: 1, 12-21; 40: 3-5
1 प्रभु ने आँधी में से अय्यूब को इस प्रकार उत्तर दिया:
12 क्या तुमने अपने सारे जीवन में कभी भोर को बुलाया अथवा उषा को उसका स्थान बतलाया?
13 क्या तुमने आदेश दिया कि वह पृथ्वी के छोरों को पकड़ कर झटका दे, जिससे दुष्ट जन उसके तल पर से लुप्त हो जायें?
14 मुहर लगने से जैसे मिट्टी बदलती है, उसी तरह पृथ्वी बदलती है और वस्त्र की तरह उस पर रंग चढ़ जाता है।
15 उषा दुष्टों से उनका प्रकाश छीन लेती है और उनका ऊपर उठा हुआ हाथ तोड़ देती है।
16 क्या तुम समुद्र के स्रोतों तक उतरे हो या गर्त्त के तल पर टहल चुके हो?
17 क्या तुम्हें मृत्यु के फाटक दिखाये गये? क्या तुमने अधोलोक के फाटक देखे?
18 क्या तुम को पृथ्वी के विस्तार का कुछ अनुमान है? यदि तुम जानते हो, तो यह सब मुझे बता दो।
19 प्रकाश के निवास का मार्ग कहाँ है और अन्धकार का आवास कहाँ है?
20 क्या तुम दोनों को उनके अपने स्थान की ओर, उनके अपने निवास के मार्ग पर ले जा सकते हो?
21 यदि तुम यह सब जानते हो, तो उन से पहले तुम्हारा जन्म हुआ था और तुम्हारे वर्षों की संख्या असीम है!
3 अय्यूब ने यह कहते हुए प्रभु को उत्तर दिया:
4 मैं कुछ भी नहीं हूँ। मैं तुझे क्या उत्तर दूँ! मैं होंठों पद अपनी उँगली रखता हूँ।
5 मैं एक बार बोला, मैं दुबारा उत्तर नहीं दूँगा; मैं दो बार बोला, मैं और कुछ नहीं कहूँगा।
📘 सुसमाचार : मत्ती 18: 1-5, 10
1 उस समय शिष्य ईसा के पास आ कर बोले, “स्वर्ग के राज्य में सब से बड़ा कौन है?”
2 ईसा ने एक बालक को बुलाया और उसे उनके बीच खड़ा कर
3 कहा, “मैं तुम लोगों से यह कहता हूँ- यदि तुम फिर छोटे बालकों-जैसे नहीं बन जाओगे, तो स्वर्ग के राज्य में प्रवेश नहीं करोगे।
4 इसलिए जो अपने को इस बालक-जैसा छोटा समझता है, वह स्वर्ग के राज्य में सब से बड़ा है
5 और जो मेरे नाम पर ऐसे बालक का स्वागत करता है, वह मेरा स्वागत करता है।
10 “सावधान रहो, उन नन्हों में एक को भी तुच्छ न समझो। मैं तुम से कहता हूँ- उनके दूत स्वर्ग में निरन्तर मेरे स्वर्गिक पिता के दर्शन करते हैं।
