सामान्य काल का तीसवाँ रविवार


📒 पहला पाठ: निर्गमन ग्रन्थ 22: 20-26

20 “तुम लोग परदेशी के साथ अन्याय मत करो, उस पर अत्याचार मत करो, क्योंकि तुम भी मिस्र देश में परदेशी थे।
21 तुम विधवा अथवा अनाथ के साथ दुर्व्यवहार मत करो।
22 यदि तुम उनके साथ दुर्व्यवहार करोगे और वे मेरी दुहाई देंगे, तो मैं उनकी पुकार सुनूँगा
23 और मेरा क्रोध भड़क उठेगा। मैं तुम को तलवार के घाट उतरवा दूँगा और तुम्हारी पत्नियाँ विधवा और तुम्हारे बच्चे अनाथ हो जायेंगे।
24 ”यदि तुम अपने बीच रहने वाले किसी दरिद्र देश-भाई को रुपया उधार देते हो, तो सूदख़ोर मत बनो – तुम उस से ब्याज मत लो।
25 यदि तुम रेहन के तौर पर किसी की चादर लेते हो, तो सूर्यास्त से पहले उसे लौटा दो;
26 क्योंकि ओढ़ने के लिए उसके पास और कुछ नहीं है। वह उसी से अपना शरीर ढक कर सोता है। यदि वह मेरी दुहाई देगा, तो मैं उसकी सुनूँगा, क्योंकि मैं दयालु हूँ।


📙 दूसरा पाठ:1 थेसेलनीकियों 1: 5-10

5 क्योंकि हमने निरे शब्दों द्वारा नहीं, बल्कि सामर्थ्य, पवित्र आत्मा तथा दृढ़ विश्वास के साथ आप लोगों के बीच सुसमाचार का प्रचार किया। आप लोग जानते हैं कि आपके कल्याण के लिए हमारा आचरण आपके यहाँ कैसा था।

6 आप लोगों ने हमारा तथा प्रभु का अनुसरण किया और घोर कष्टों का सामना करते हुए पवित्र आत्मा की प्रेरणा से आनन्दपूर्वक सुसमाचार स्वीकार किया।

7 इस प्रकार आप मकेदूनिया तथा अखै़या के सब विश्वासियों के लिए आदर्श बन गये।

8 आप लोगों के यहाँ से प्रभु का सुसमाचार न केवल मकेदूनिया तथा अखैया में फैला, बल्कि ईश्वर में आपके विश्वास की चर्चा सर्वत्र हो रही है। हमें कुछ नहीं कहना है।

9 लोग स्वयं हमें बताते है। कि आपके यहाँ हमारा कैसा स्वागत हुआ और आप किस प्रकार देवमूर्तियाँ छोड़ कर ईश्वर की ओर अभिमुख हुए,

10 जिससे आप सच्चे तथा जीवन्त ईश्वर के सेवक बनें और उसके पुत्र ईसा की प्रतीक्षा करें, जिन्हें ईश्वर ने मृतकों में से जिलाया। यही ईसा स्वर्ग से उतरेंगे और हमें आने वाले प्रकोप से बचायेंगे।


📘 सुसमाचार : मत्ती 22: 34-40

34 जब फ़रीसियों ने यह सुना कि ईसा ने सदूकियों का मुँह बन्द कर दिया था, तो वे इकट्ठे हो गये

35 और उन में से एक शास्त्री ने ईसा की परीक्षा लेने के लिए उन से पूछा,

36 “गुरुवर! संहिता में सब से बड़ी आज्ञा कौन-सी है?”

37 “ईसा ने उस से कहा, “अपने प्रभु-ईश्वर को अपने सारे हृदय, अपनी सारी आत्मा और अपनी सारी बुद्धि से प्यार करो।

38 यह सब से बड़ी और पहली आज्ञा है।

39 दूसरी आज्ञा इसी के सदृश है- अपने पड़ोसी को अपने समान प्यार करो।

40 इन्हीं दो आज्ञाओं पर समस्त संहिता और नबियों की शिक्षा अवलम्बित हैं।”