प्रभु यीशु के जन्म का महापर्व

📒 पहला पाठ: इसायाह 62: 11-12

11 यह है समस्त पृथ्वी के लिए ईश्वर का सन्देश। “सियोन की पुत्री से यह कहोः ’देख! तेरे मुक्तिदाता आ रहे हैं वह अपना पुरस्कार अपने साथ ला रहे हैं और उनका विजयोपहार भी उनके साथ है’।”

12 वे ’पवित्र प्रजा’ और ’प्रभु के मुक्ति-प्राप्त लोग कहलायेंगे और तेरा नाम ’परमप्रिय’ तथा ’अपरित्यक्त नगरी’ रखा जायेगा।


📙 दूसरा पाठ: इब्रानियों 1: 1-6

1 प्राचीन काल में ईश्वर बारम्बार और विविध रूपों में हमारे पुरखों से नबियों द्वारा बोला था।

2 अब अन्त में वह हम से पुत्र द्वारा बोला है। उसने उस पुत्र के द्वारा समस्त विश्व की सृष्टि की और उसी को सब कुछ का उत्तराधिकारी नियुक्त किया है।

3 वह पुत्र अपने पिता की महिमा का प्रतिबिम्ब और उसके तत्व का प्रतिरूप है। वह पुत्र अपने शक्तिशाली शब्द द्वारा समस्त सृष्टि को बनाये रखता है। उसने हमारे पापों का प्रायश्चित किया और अब वह सर्वशक्तिमान् ईश्वर के दाहिने विराजमान है।

4 उसका स्थान स्वर्गदूतों से ऊँचा है; क्योंकि जो नाम उसे उत्तराधिकार में मिला है, वह उनके नाम से कहीं अधिक श्रेष्ठ है।

5 क्या ईश्वर ने कभी किसी स्वर्गदूत से यह कहा- तुम मेरे पुत्र हो, आज मैंने तुम्हें उत्पन्न किया है और मैं उसके लिए पिता बन जाऊँगा और वह मेरा पुत्र होगा?

6 फिर वह अपने पहलौठे को संसार के सामने प्रस्तुत करते हुए कहता है- ईश्वर के सभी स्वर्गदूत उसकी आराधना करें,


📘 सुसमाचार :योहन 1: 1-18

1 आदि में शब्द था, शब्द ईश्वर के साथ था और शब्द ईश्वर था।

2 वह आदि में ईश्वर के साथ था।

3 उसके द्वारा सब कुछ उत्पन्न हुआ। और उसके बिना कुछ भी उत्पन्न नहीं हुआ।

4 उस में जीवन था, और वह जीवन मनुष्यों की ज्योति था।

5 वह ज्योति अन्धकार में चमकती रहती है- अन्धकार ने उसे नहीं बुझाया।

6 ईश्वर को भेजा हुआ योहन नामक मनुष्य प्रकट हुआ।

7 वह साक्षी के रूप में आया, जिससे वह ज्योति के विषय में साक्ष्य दे और सब लोग उसके द्वारा विश्वास करें।

8 वह स्वयं ज्यांति नहीं था; उसे ज्योति के विषय में साक्ष्य देना था।