
पठन योजना में आज पढ़ें :(यिरमियाह का ग्रन्थ 20-21 ),( दानिएल का ग्रन्थ 1- 2), (सूक्ति-ग्रन्थ 15: 25-28)
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यिरमियाह 20
1 इम्मेर का पुत्र, याजक पशहूर, प्रभु के मन्दिर का प्रमुख निरीक्षक था। उसने यिरमियाह की यह भवियवाणी सुन कर
2 उसे पिटवाया और मन्दिर के बेनयामीन नामक ऊपरी के फाठक के काठ में डलवाया।
3 जब पशहूर ने दूसरे दिन यिरमियाह को काठ से निकलवाया, तो यिरमियाह ने उस से कहा, “अब से प्रभु तुम को ’पशहूर’ नहीं, बल्कि ’मागोर’ (चारों ओर आतंक कह कर पुकारेगा;
4 क्योंकि प्रभु यह कहता हैः “तुम अपने और अपने मित्रों के लिए आतंक के कारण बनोगे। वे अपने शत्रुओं की तलवारों से मारे जायेंगे और यह तुम स्वयं अपनी आँखों से देखोगे। मैं यूदा के सब लोगों को बाबुल के राजा के हवाले कर दूँगा; वह उन्हें बाबुल में निर्वासित करेगा और उन्हें तलवार के घाट उतारेगा।
5 मैं इस नगर की समस्त सम्पत्ति उनके शत्रुओं के हाथ में दूँगा- इसके परिश्रम का सारा फल, इसकी सब बहुमूल्य वस्तुएँ और यूदा के राजाओं के सारे ख़जाने। वे यह लूटेंगे और बाबुल ले जायेंगे
6 और तुम पशहूर! तुम अपने घर के सब लोगों के साथ बन्दी बना कर बाबुल ले जाये जाओगे। वहाँ तुम्हारी मृत्यु हो जायेगी और तुम्हारा दफ़न किया जायेगा- तुम और तुम्हारे सभी मित्र, जिन्हें तुमने झूठी भवियवाणियाँ सुनायी हैं’।“
7 प्रभु! तूने मुझे राज़ी किया और मैं मान गया। तूने मुझे मात कर दिया और मैं हार गया। मैं दिन भर हँसी का पात्र बना रहता हूँ। सब-के-सब मेरा उपहास करते हैं।
8 जब-जब मैं बोलता हूँ, तो मुझे चिल्लाना और हिंसा तथा विध्वंस की घोषणा करनी पड़ती हैं। ईश्वर का वचन मेरे लिए निरंतर अपमान तथा उपहास का कारण बन गया हैं।
9 जब मैं सोचता हूँ, मैं उसे भुलाऊँगा, मैं फिर कभी उसके नाम पर भविय वाणी नहीं करूँगा“ तो उसका वचन मेरे अन्दर एक धधकती आग जैसा बन जाता है, जो मेरी हड्डी-हड्डी में समा जाती है। मैं उसे दबाते-दबाते थक जाता हूँ और अब मुझ से नहीं रहा जाता।
10 मैंने बहुतों को यह फुसफुसाते हुए सुना है- “चारों ओर आतंक फैला हुआ हैं। उस पर अभियोग लगाओ! हम उस पर अभियोग लगायें“। जो पहले मेरे मित्र थे, वे सब इस ताक में रहते हैं कि मैं कोई ग़लती कर बैठूँ और कहते हैं, “वह शायद भटक जायेगा और हम उस पर हावी हो कर उस से बदला लेंगे”।
11 परन्तु प्रभु एक पराक्रमी शूरवीर की तरह मेरे साथ हैं। मेरे विरोधी ठोकर खा कर गिर जायेंगे। वे मुझ पर हावी नहीं हो पायेंगे और अपनी हार का कटु अनुभव करेंगे। उनका अपयश सदा बना रहेगा।
12 विश्वमण्डल के प्रभु! तू धर्मी की परीक्षा करता और मन तथा हृदय की थाह लेता है। मैं अपने को तुझ पर छोड़ता हूँ। मैं दूखूँगा कि तू उन लोगों से क्या बदला लेता है।
13 प्रभु का गीत गाओ! प्रभु की स्तुति करो! क्योंकि वह दरिद्रों के प्राणों को दुष्टों के हाथ से छुडाता है।
14 जिस दिन मैं पैदा हुआ, वह अभिशप्त हो जिस दिन मेरी माता ने मुझे जन्म दिया, उसे आशीर्वाद न मिले।
15 अभिशप्त हो वह व्यक्ति, जिसने मेरे पिता से कहते हुए उसे आनन्दित किया, “तुम को एक पुत्र पैदा हुआ है।“
16 वह व्यक्ति उन नगरों-जैसा बने, जिनका प्रभु ने बिना दया किये विनाश किया है। उसे प्रातः चीत्कार सुनाई पड़े और दिन में लड़ाई का नारा।
17 प्रभु ने मुझे गर्भ में क्यों नहीं मारा, जिससे मेरी माता मेरी कब्र बन जाती और मैं उसके गर्भ में सदा पड़ा रहता?
18 मैं अपनी माता के गर्भ से क्यों निकला, जिससे मैं कष्ट और दुःख ही सहता रहूँ और प्रतिदिन लज्जा का अनुभव करूँ?
यिरमियाह 21
1 प्रभु की वाणी यिरमियाह को सुनाई पड़ी, जब राजा सिदकीया ने उसके पास मलकीया के पुत्र पशहूर और मासेया के पुत्र याजक सफ़न्या को यह पूछने भेजा,
2 “बाबुल का राजा नबूकदनेज़र हम पर आक्रमण कर रहा है। इस सम्बन्ध में प्रभु से परामर्श लो। संभव है कि प्रभु हमारे लिए अपना कोई ऐसा चमत्कार दिखाये, जिससे वह हम पर आक्रमण करने का विचार छोड़ दे।“
3 यिरमियाह ने उन से कहा, “तुम सिदकीया से यह कहोगे, ’प्रभु इस्राएल का ईश्वर यह कहता हैः
4 जिन सैनिकों के सहारे तुम अपने को घेरने वाले बाबुल के राजा और खल्दैयियों के विरुद्ध चारदीवारी के बाहर लड़ते हो, मैं उन्हें इस नगर के भीतर भगा दूँगा;
5 क्योंकि मैं स्वयं अपना बाहुबल प्रकट करते हुए तुम पर अपना हाथ उठाऊँगा और प्रचण्ड प्रकोप एवं क्रोध के आवेश में तुम्हारे विरुद्ध लड़ूँगा।
6 मैं इस नगर में रहने वाले मनुष्यों और पशुओं को मारूँगा; वे भयंकर महामारी के शिकार बनेंगे।
7 इसके बाद मैं यूदा के राजा सिदकीया, उसके अधिकारियों और उन लोगों को, जो इस नगर में महामारी, तलवार और भूखमारी से बच जायेंगे, बाबुल के राजा के हाथ- उनके शत्रुओं और उनके प्राणों के गाहकों के हाथ-दे दूँगा। वह उन्हें तलवार के घाट उतरवा देगा।
8 “तुम लोगों से कहोगे, “प्रभु यह कहता हैः मैं तुम्हारे सामने जीवन का मार्ग और मृत्यु का मार्ग रखता हूँ। तुम स्वयं चुनो।
9 जो इस नगर में रहेगा, वह तलवार, भुखमरी या महामारी से मारा जायेगा। जो नगर छोड कर तुम्हें घेरने वाले खल्दैयियों के सामने आत्मसमर्पण करेगा, वह जीवित रहेगा और अपने प्राण बचायेगा।
10 मैंने इस नगर के साथ भलाई नहीं, बल्कि अनिष्ट करने का निश्चिय किया है। यह प्रभु की वाणी है। यह बाबुल के राजा के हाथ दिया जायेगा और वह इसे जला देगा।’
11 “यूदा के राजवंश! प्रभु की वाणी सुनों।
12 दाऊद के घराने! प्रभु यह कहता हैः “प्रतिदिन सबेरे न्याय करो। जो लुट रहा है, अत्याचारी के हाथ से उसकी रक्षा करो। ऐसा न हो कि मेरा क्रोध आग की तरह भडक उठे और तुम्हारे कुकर्मों के कारण उसे बुझाने वाला कोई न रहे।
13 प्रभु यह कहता हैः तुम, जो घाटी के ऊपर चट्टान पर अवस्थित हो! मैं तुम्हारे विरुद्ध हूँ। तुम डींग मारते हुए कहते हो, “कौन हम पर आक्रमण कर सकता है हमारे गढ़ में कौन प्रवेश कर पायेगा?“
14 मैं तुम्हारे कुकर्मों के अनुसार तुम को दण्ड दूँगा। यह प्रभु की वाणी हैं। मैं तुम्हारे जंगलों में ऐसी आग लगाऊगा, जो आसपास का सारा प्रदेश जला देगी।”
दानिएल 1
1 यूदा के राजा यहोयाकीम के राज्यकाल के तीसरे वर्ष बाबुल के राजा नबूकदनेज़र ने येरूसालेम आ कर उसके चारों ओर घेरा डाला।
2 प्रभु ने यूदा के राजा यहोयाकीम को और ईश्वर के मन्दिर के कुछ पात्रों को नबूकदनेज़र के हाथ जाने दिया। उसने उन्हें शिनआर देश भिजवाया और पात्रों को अपने देवताओं के कोष में रखवा दिया।
3 राजा ने खोजों के अध्यक्ष अशपनज को कुछ ऐसे इस्राएली नवयुवकों को ले आने का आदेश दिया, जो राजवंशी अथवा कुलीन हों,
4 शारीरिक दोषरहित, सुन्दर, समझदार, सुशिक्षित, प्रतिभाशाली और राज-दरबार में रहने योग्य हों। अशपनज ने उन्हें खल्दैयियों का साहित्य और भाषा पढायी।
5 राजा ने राजकीय भोजन और अंगूरी में से उनके लिए खाने-पीने का दैनिक प्रबंध किया। उन्हें तीन वर्ष का प्रशिक्षण दिया जाने वाला था और उसके बाद वे राजा की सेवा में नियुक्त किये जाने वाले थे।
6 उन में यूदावंशी दानिएल, हनन्या, मीशाएल और अज़र्या थे।
7 खोजों के अध्यक्ष ने उन्हें ये नये नाम दिये: उसने दानिएल को बेल्ट शस्सर, हनन्या को शद्रक, मीशाएल को मेशक और अजर्या को अबेदनगो कहा।
8 दनिएल ने निश्चय किया कि वह राजकीय भोजन और अंगूरी खा-पी कर अपने को अशुद्ध नहीं करेगा और उसने खोजों के अध्यक्ष से निवेदन किया कि वह उसे उस दूषण से बचाये रखें।
9 ईश्वर की कृपा से खोजों का अध्यक्ष दानिएल के साथ अच्छा और सहानुभूतिपूर्ण व्यवहार करता था।
10 उसने दानिएल से कहा, “मैं राजा, अपने स्वामी से डरता हूँ। उन्होंने तुम्हारा खानपान निश्चित किया है। यदि वह देखेंगे कि समवयस्क नवयुवकों की तुलना में तुम्हारा चेहरा उतरा हुआ है, तो मेरा जीवन जोखिम में पड़ जायेगा।”
11 उसके बाद दानिएल ने भोजन के प्रबन्धक से, जिसे खोजों के अध्यक्ष ने दानिएल, हनन्या, मीशाएल और अजर्या पर नियुक्त किया था, कहा,
12 “आप कृपया दस दिन तक अपने सेवकों की परीक्षा ले- हमें खाने के लिए तरकारी और पीने के लिए पानी दिलायें।
13 इसके बाद आप हमारा और राजकीय भोजन का सेवन करने वाले युवकों का चेहरा देख लें और जो आप को उचित जान पड़े, वही हमारे साथ करें।”
14 उसने उनका निवेदन स्वीकार कर लिया और दस दिन तक उनकी परीक्षा ली।
15 दस दिन बाद के राजकीय भोजन खाने वाले युवकों की तुलना में अधिक स्वस्थ और हष्ट-पुष्ट दीख पड़े।
16 उस समय से प्रबन्धक उनके लिए निर्धारित किया हुआ खान-पान हटा कर उन्हें तरकारी देता रहा।
17 ईश्वर ने उन चार नवयुवकों को ज्ञान, समस्त साहित्य की जानकारी और प्रज्ञा प्रदान की। दानिएल को दिव्य दृश्यों और हर प्रकार के स्वप्नों की व्याख्या करने का वरदान प्र्राप्त था।
18 राजा द्वारा निर्धारित अवधि की समाप्ति पर खाजों के अध्यक्ष ने नवयुवकों को नबूकदनेज़र के सामने प्रस्तुत किया।
19 राजा ने उनके साथ वार्तालाप किया और उन में कोई भी दानिएल, हनन्य, मीशाएल और अजर्या की बराबरी नहीं कर सका। वे राजा की सेवा में नियुक्त हो गये।
20 जब जब राजा ने किसी समस्या पर उन से परामर्श लिया, तो उसने पाया कि समस्त राज्य के किसी भी ज्योतिषी अथवा ओझा से उनकी प्रज्ञा और विवेक दसगुना श्रेष्ठ था।
21 दानिएल राजा सीरूस के प्रथम वर्ष तक वहाँ रहा।
दानिएल 2
1 अपने शासनकाल के दूसरे वर्ष नबूकदनेज़र ने स्वप्न देखे, जिनके कारण वह इतना घबरा उठा कि उसकी नींद जाती रही।
2 तब राजा ने अपने स्वप्नों का अर्थ बतलाने लिए जादूगरों, ओझाओं, तांत्रिकों एवं खल्दैयियों को बुला भेजा। वे आ कर राजा के सामने उपस्थित हो गये।
3 राजा ने उन से कहा, “मैंने स्वप्न देखा है। और मैं उसे समझने को बहुत व्याकुल हूँ।”
4 खल्दैयियों ने राजा से कहा, “महाराज चिरायु हों! अपने दासों से अपना स्वप्न कहें, जिससे हम उसका अर्थ लगा सकें।
5 राजा ने खल्दैयियों को उत्तर दिया, “मेरा वचन अटल है: यदि तुम लोग मेरा स्वप्न और उसका अर्थ नहीं बताओगे, तो तुम्हारे अंग-अंग काट दिये जायेंगे और तुम्हारे घर तबाह कर दिये जायेंगे।
6 किन्तु स्वप्न और उसका अर्थ बतला दोगे, तो मैं तुम लोगों को उपहार, पुरस्कार तथा भारी सम्मान दूँगा। इसलिए मुझे स्वप्न और उसका अर्थ बताओ।”
7 उन लोगों ने फिर निवेदन किया, “महाराज ! अपने दासों को यह बतायें कि स्वप्न क्या था, तो हम लोग उसका अर्थ लगायेंगे”
8 राजा ने उत्तर दिया, ’यह स्पष्ट है कि तुम लोग टाल-मटोल कर रहे हो, क्योंकि तुम जानते हो कि मेरा वचन अलट है। यदि तुम मेरे स्वप्न का अर्थ मुझे नहीं बताओगे तो तुम्हारा प्राणदण्ड निश्चित है।
9 तुम लोगों ने तब तक के लिए मुझ से झूठ और मिथ्या बातें कहने का समझौता कर लिया है, जब तक कि समय न बदल जाये। इसलिए पहले मुझे स्वप्न बताओ, जिससे मैं यह जान जाऊँगा, कि तुम उसका अर्थ बता सकोगे।”
10 खल्दैयियों ने राजा को उत्तर दिया, “संसार में ऐसा कोई नहीं है, जो राजा की यह माँग पूरी कर सके। किसी भी महाप्रतापी राजा ने किसी जादूगर, ओझा या खल्दैयी से कभी ऐसी माँग नहीं की है।
11 आप कठिन से कठिन बात पूछ रहे हैं। राजा की यह बात उन देवताओं के सिवा, जो शरीरधारियों के लोक में नहीं रहते, और कोई नहीं बता सकता।”
12 यह सुन कर राजा बहुत क्रेाधित हुआ और उसने बाबुल के सभी विद्वानों को मार डालने की आज्ञा निकाली।
13 अतः जब यह आज्ञा निकली कि सभी विद्वानों का वध कर दिया जाये, उन्होंने वध करने के लिए दानिएल और उसके साथियों को ढँढ़ निकाला।
14 जब राजा के अंगरक्षकों का नायक अर्योक विद्वानों को मार डालने के लिए तैयारी कर रहा था, तब दानिएल नायक के पास आया और बड़ी सूझ-बूझ से परामर्श करके बोला,
15 “राजा ने ऐसी कठोर आज्ञा क्यों निकाली है?” इस पर अर्योक ने दानिएल को सारी बातें बता दी।
16 तब राजा के पास जा कर दानिएल ने यह प्रार्थना की कि मुझे समय दीजिए और मैं स्वप्न और उसका अर्थ बता दूँगा।
17 इसके बाद दानिएल ने अपने घर जा कर यह बात अपने साथी हनन्या, मीशाएल और अजर्या से बतायी।
18 उसने यह भी कहा कि यह भेद जानने के लिए स्वर्ग में विराजमान ईश्वर से दया की प्रार्थना करें, जिससे बाबुल के अन्य विद्वानों के साथ हम भी नष्ट न हो जायें।
19 जब रात के समय दिव्य दर्शन के द्वारा दानिएल के सामने से भेद खुल गया।
20 और वह इस प्रकार स्वर्ग में विराजमान ईश्वार का गुणगान करने लगाः ईश्वर का नाम सदा-सर्वदा धन्य है, प्रज्ञा और शक्ति उसी की है;
21 काल और ऋतु उसी के हाथ में हैं; वही राजाओं की प्रतिष्ठा करता और उनके सिंहासन उलटता है। वही विद्वानों को प्रज्ञा देता है और समझदारों को समझ।
22 वही गूढ़ रहस्यों को प्रकट करता है, वही अंधकार में छिपे भेद जानता है, क्योंकि उस में ज्योति का निवास है।
23 हमारे पूर्वजों के ईश्वर! मैं तरा धन्यवाद करता हूँ, मैं तरा यश गाता हूँ, क्योंकि तूने मुझे प्रज्ञा और शक्ति प्रदान की है; जो हमने मांगा है, तूने उसे प्रकट किया है और राजा का भेद हमें बता दिया है।
24 तब दानिएल अर्योंक के पास गया, जिस को राजा ने बाबुल के विद्वानों को मार डालने का आदेश दिया था। दानिएल उस से बोला, “बाबुल के विद्वानों का वध नहीं कीजिए; मुझे राजा के पास ले चालिए; मैं राजा को स्वप्न का अर्थ बतला दूँगा”।
25 अतः दानिएल को शीघ्र ही राजा के पास ले जा कर अर्योक ने उस से कहा, “मुझे यूदा के निर्वासितों में एक मनुष्य मिला है, जो राजा के स्वप्न अर्थ बता सकता है।“
26 दानिएल से (जिसका नाम बेल्टशस्सर हो गया था) राजा ने पूछा, “मैंने स्वप्न देखा है, क्या तुम मुझे उसे बता कर उसका अर्थ भी लगा सकते हो?”
27 दानिएल ने राजा को उत्तर दिया, ’जो भेद राजा पूछ रहे हैं उसका न कोई विद्वान, न कोई ओझा, न कोई जादूगर और न ही कोई ज्योतिषी उद्घाटन कर सकता है।
28 किन्तु स्वर्ग में विराजमान ईश्वर रहस्यमय दर्शन देता है और उसी ने राजा नबूकदनेज़र पर इस युग के अंत में होने वाली घटनाएँ प्रकट की हैं। आपका स्वप्न और नींद में देखे गये दर्शन इस प्रकार हैं:
29 राजा! जब आप शय्या पर पड़े हुए थे, तो आपके मन में यह विचार आया कि भविय में क्या होगा औैर जो रहस्यों को प्रकट करता है, उसने आप पर भविय प्रकट किया है।
30 मुझ पर यह रहस्य इसलिए नहीं प्रकट किया गया है कि मैं अन्य प्राणियों से अधिक बुद्धिमान हूँ, बल्कि इसलिए कि मैं राजा को उसका अर्थ बतला कर आपके मन के विचारों को समझा दूँ।
31 राजा! आपने यह दिव्य दृश्य देखा। एक विशाल, देदीप्यमान और भीषण मूर्ति आपके सामने खड़ी थी।
32 उस मूर्ति का सिर सोने का था, उसकी छाती और भुजाएँ चाँदी की थी, उसका पेट और कमर पीतल की,
33 उसकी जाँघें लोहे की और उसके पैर अंशतः लोहे के और अंशतः मिट्टी के थे।
34 आप उसे देख ही रहे थे कि एक पत्थर अचानक अपने आप गिरा, उस मूर्ति के लोहे और मिट्टी के पैरों पर लगा गया और उसने उनके टूकडे-टुकड़े कर डाले।
35 उसी समय लोहा, मिट्टी, पीतल, चाँदी और सोना सब चूर-चूर हो क्रर हो कर ग्रीष्म-ऋतु की भूसी की तरह पवन द्वारा उड़ा लिया गया और उसका कुछ भी शेष नहीं रहा। जो पत्थर मूर्ति पर लग गया था, वह समस्त पृथ्वी को ढकने वाला विशाल पर्वत बन गया।
36 यह था आपका स्वप्न। अब मैं आप को उसका अर्थ बताऊँगा।
37 राजा! आप राजाओं को राजा हैं।
38 स्वर्ग के ईश्वर ने आप को राजत्व, अधिकार, सामर्थ्य और सम्मान प्रदान किया। उसने मनुष्यों, मैदान के पशुओं और आकाश के पक्षियों को- वे चाहें कहीं भी निवास करें- आपके हाथों सौंपा और आप को सब का अधिपति बना दिया। मूर्ति के सोने का सिर आप ही हैं।
39 आपके बाद का दूसरा राज्य आयेगा। वह आपके राज्य से कम वैभवशाली होगा और इसके बाद एक तीसरा राज्य, जो पीतल का होगा और समस्त पृथ्वी पर शासन करेगा।
40 चैथा राज्य लोहे की तरह मजबूत होगा। जिस प्रकार लोहा सब कुछ पीस कर चूर कर सकता है, उसी प्रकार वह राज्य पहले के राज्यों को चूर-चूर कर नष्ट कर देगा।
41 आपने देखा है कि वे पैर अंशतः मिट्टी के और अशंतः लोहे के थे- इसका अर्थ है कि उस राज्य में फूट होगी।
42 उस में लोहे की शक्ति होगी, क्योंकि आपने देखा है कि मिट्टी में लोहा मिला हुआ था।
43 उसके पैर अशंतः लाहेे और अशंत: मिट्टी के थे- इसका अर्थ यह है कि उस राज्य का एक भाग शक्तिशाली और एक भाग दुर्बल होगा। आपने देखा है कि लोहा मिट्टी से मिला हुआ था- इसका अर्थ है कि विवाह-सम्बन्ध द्वारा राज्य के भागों को मिलाने का प्रयत्न किया जायेगा, किन्तु वे एक नहीं हो जायेंगे जिस तरह लोहा मिट्टी से एक नहीं हो सकता है।
44 “इन राज्यों के समय स्वर्ग का ईश्वर एक ऐसे राज्य की स्थापना करेगा, जो अनंत काल तक नष्ट नहीं होगा और जो दूसरे राष्ट्र के हाथ नहीं जायेगा। वह इन राज्यों को चूर-चूर कर नष्ट कर देगा और सदा बना रहेगा।
45 आपने देखा है कि अपने आप पर्वत पर से एक पत्थर गिर गया और उसने लोहा, पीतल, मिट्टी चाँदी और सोने को चूर-चूर कर दिया है, महान् ईश्वर ने राजा को सूचित किया कि भविय में क्या होने वाला है। यह स्वप्न सच्चा है और इसकी व्याख्या विश्वसनीय है।”
46 यह सुन कर राजा नबूकदनेज़र ने मुँह के बल गिर कर दानिएल की पूजा की और आदेश दिया कि उनके सामने नैवेद्य और धूप चढ़ायी जाये।
47 राजा ने दानिएल से कहा, “तुम्हारा ईश्वर सचमुच सभी देवताओं का प्रभु और सभी राजाओं का स्वामी है। वही सब रहस्यों को प्रकट करता है, क्येंकि यह रहस्य केवल तुम पर प्रकट कर सके। “
48 तब राजा ने उच्च पद पर दानिएल को नियुक्त कर उसे अनेक बहुमूल्य उपहार दिये और उसे बाबुल के समस्त प्रान्त का शासक बना दिया तथा बाबुल के विद्वानों का अध्यक्ष नियुक्त किया।
49 यह नहीं, दानिएल के अनुरोध पर राजा के बाबुल प्रांत के प्रशासनिक कार्यों की देखरेख के लिए शद्रक, मेशक और अबेदनगो को नियुक्त किया। दानिएल राजदरवार में ही रह गया।
सूक्ति-ग्रन्थ 15: 25-28
25 प्रभु घमण्डियों का घर गिराता, किन्तु विधवा के खेत के सीमा-पत्थर की रक्षा करता है।
26 प्रभु को दुष्टों की योजनाओं से घृणा है, किन्तु प्रेममय वचन उसे प्रिय है।
27 पाप की कमाई एकत्र करने वाला अपना घर संकट में डालता है, किन्तु घूस से घृणा करने वाला जीवित रहेगा।
28 धर्मी सोच-समझ कर उत्तर देता है, किन्तु दुष्टों के मुख से बुराई प्रकट होती है।