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पठन योजना में आज पढ़ें :( मक्काबियों का पहला ग्रन्थ 16 ) , (प्रवक्ता ग्रन्थ 38-39)(सूक्ति-ग्रन्थ 23: 29-35)

(Read in English)

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1 मक्काबियों 16

1 तब योहन गेज़ेर से अपने पिता सिमोन के पास गया और उसे कन्देबैयस के आतंक के विषय में बतलाया।
2 सिमोन ने अपने दो बड़े पुत्र यूदाह और योहन से कहा, “मैं, मेरे भाई और मेरे कुटुम्बी अपने बचपन से आज तक इस्राएल के लिए लड़ते आये हैं। न जाने कितनी बार हमारे हाथों ने इस्राएल की रक्षा की है।
3 अब मैं वृद्ध हो चला हूँ, लेकिन तुम प्रभु की दया से युद्ध करने योग्य हो गये हो। तुम मेरी तथा मेरे भाई की जगर हमारे राष्ट्र के लिए लड़ने जाओ। प्रभु की सहायता तुम्हारे साथ हो।”
4 उसने देश से बीस हज़ार सैनिक और घुड़सवार चुने और वे कन्देबैयस के विरुद्ध युद्ध करने चले। उन्होंने मोदीन में रात बितायी।
5 फिर वे भोर को मैदान की ओर आगे बढे़। वहाँ उन्होंने यह देखा कि घुड़सवारों और पैदल सैनिकों की एक विशाल सेना उनके सामने है। दोनों के बीच एक नदी थी।
6 योहन ने अपने आदमियों के साथ शत्रुओं के सामने पड़ाव डाला। जब उसे पता चला कि उसके आदमी नदी पार करने से डर रहे हैं, तो उसने सब से पहले नदी पार की। यह देखकर उसके सैनिक भी उसके बाद पार हुए।
7 उसने अपनी सेना को दो दलों में बाँट दिया और पैदल सैनिकों के बीच घुड़सवार रखे; क्योंकि शत्रुओं के घुड़सवारों की संख्या बहुत बडी थी।
8 तुरहियाँ बज उठीं। कन्देबैयस और उसकी सेना भाग निकली। उसके कितने ही लोग मारे गये और जो बच गये, उन्होंने भाग कर गढ में शरण ली।
9 उस समय योहन का भाई यूदाह घायल हो गया; किन्तु योहन ने शत्रुओं को केद्रोन तक खदेड़ दिया, जिसका कन्देबैयस ने पुनर्निर्माण किया था।
10 भागने वालों ने अज़ोत के मैदान के बुर्जों में शरण ली। योहन ने नगर को जला दिया। शत्रुओं में लगभग दो हजार मारे गये। योहान सकुशल यहूदिया लौट आया।
11 अबूबस का पुत्र पतोलेमेउस येरीख़ो के मैदान की सेना का अध्यक्ष नियुक्त किया गया।
12 उसके पास बहुत चाँदी-सोना था, क्योंकि वह प्रधानयाजक का दामाद था।
13 वह घमण्डी हो गया और देश पर अधिकार करने की सोचने लगा। उसने सिमोन और उसके पुत्रों का वध करने की कपटपूर्ण योजना बनायी।
14 सिमोन प्रशासक के रूप में देश के नगरों को भ्रमण करता था। एक सौ सत्तरवें वर्ष के शबाट महीने में वह, उसके पुत्र मत्तथ्या और यूदाह येरीखो़ आये।
15 अबूबस के पुत्र ने अपने बनवाये दोक नामक छोटे गढ़ में उनका कपटपूर्ण स्वागत-सत्कार किया। उसने उन्हें दावत दी और पास ही सैनिकों को छिपा रखा।
16 जब सिमोन और उसके पुत्र पी चुके, तो पतोलेमेउस और उसके आदमी उठे और हथियार लिये भोज-गृह में घुस आये। वे सिमोन पर टूट पडे और उसे, उसने दो पुत्रों तथा उनके साथियों में अनेक का वध किया।
17 इस प्रकार उसने भलाई का बदला बुराई से चुका कर घोर विश्वासघात किया
18 इसके बाद पतोलेमेउस ने इस विषय में राजा को लिखित विवरण भेजा और निवेदन किया कि वह उसकी सहायता के लिए सैनिक भेजे, जिससे वह नगरों के साथ देश को राजा के हाथ दे सके।
19 उसने कुछ अन्य लोगों को गेजे़र भेजा, जिससे वे योहन को समाप्त करें। उसने सेनापतियों के नाम पत्र भेज कर उन्हें अपने यहाँ आने का निमन्त्रण दिया, जिससे वह उन्हें चाँदी, सोना और उपहार दे।
20 उसने अन्य लोगों को येरूसालेम और मन्दिर के पर्वत पर अधिकार करने भेजा।
21 किन्तु उन में एक आदमी आगे दौड़ कर गेजे़र में योहन के पास यह सन्देश लाया कि उसके पिता और उसके भाई मार डाले गये हैं और उसे सावधान किया कि पतोलेमेउस ने आपका भी वध करने आदमी भेजे हैं।
22 यह सुन कर योहन भयभीत हो उठा और उन आदमियों को पकड़वाया और मरवा डाला, जो उसका वध करने आये थे; क्योंकि उसे मालूम हो गया था कि वे उसकी हत्या करने आये थे।
23 योहन का शेष इतिहास-उसकी लड़ाईयों, उसकी वीरता, उसके द्वारा दीवारों का निर्माण और उसके अन्य कार्यों का वर्णन यह सब,
24 उन दिन से ले कर जब वह अपने पिता के स्थान पर प्रधानयाजक बना, प्रधानयाजकों के इतिहास-ग्रंथ में लिखा है।

प्रवक्ता ग्रन्थ 38

1 चिकित्सक का सम्मान करो, तुम को उसकी आवश्यकता है। सर्वोच्च प्रभु ने उसकी भी सृष्टि की है।

2 सर्वोच्च प्रभु से स्वास्थ्यलाभ होता और राजा की ओर से चिकित्सक को उपहार मिलता है।

3 चिकित्सक का उसके विज्ञान के कारण सम्मान किया जाता और बडे़ लोग उसकी प्रशंसा करते हैं।

4 प्रभु पृथ्वी से जड़ी-बूटियाँ उत्पन्न करता है और समझदार व्यक्ति उनकी उपेक्षा नहीं करता।

5 क्या पानी लकड़ी द्वारा मीठा नहीं बना,

6 जिससे मनुष्य प्रभु का सामर्थ्य पहचान सकें?

7 उसने मनुष्यों को विज्ञान प्रदान किया है, जिससे वे उसके चमत्कारों के कारण प्रभु की महिमा करें।

8 चिकित्सक जड़ी-बूटियों द्वारा पीड़ा दूर करता है।भेषजज्ञ उनका मिश्रण तैयार करता है, जिससे प्रभु की कृतियाँ नष्ट न हों।

9 पुत्र! अपनी बीमारी में लापरवाह न बनो; प्रभु से प्रार्थना करो और वह तुम्हें स्वास्थ्य प्रदान करेगा।

10 अपने अपराधों पर पश्चात्तप करो, अपने हाथ निर्दोष रखो और अपना हृदय हर पाप से शुद्ध रखो।

11 सुगन्धयुक्त धूप एवं अन्न-बलि चढ़ाओे और शक्ति भर तेल का अर्पण करो। चिकित्सक को निवास दो,

12 क्यों कि प्रभु ने उसकी भी सृष्टि की है। वह तुम से दूर न जाये, क्यों कि तुम को उसकी ज़रूरत है;

13 क्योंकि कभी-कभी तुम्हारा स्वास्थ्य लाभ उनके हाथ में है।

14 वे भी प्रभु से प्रार्थना करते हैं कि वह उन्हें निदान पहचानने में और जीवन की रक्षा में सफलता प्रदान करे।

15 जो अपने सृष्टिकर्ता के सामने पाप करेगा, वह चिकित्सक के हाथों पड़ेगा।

16 पुत्र! मृतक पर आँसू बहाओ और दुःखी हो कर विलाप करो। उसका शरीर योग्य रीति से दफ़नाओे और उसकी क़ब्र का ध्यान रखो।

17 फूट-फूट कर रोओ और विलाप करो।

18 लोगों की निन्दा से बचने के लिए एकाध दिन मृतक की योग्यता के अनुसार शोक मनाओे और इसके बाद अपना दुःख शान्त हो जाने दो;

19 क्यों कि शोक मृत्यु का कारण बन सकता है और मन का दुःख शक्ति घटाता है।

20 शोक विपत्ति में बना रहता है और दरिद्रता का जीवन हृदय के लिए अभिशाप है।

21 अपना हृ दय शोक में मत डूबने दो, उसे हटाओे और अपनी अन्तगति पर विचार करो।

22 मृतक को भूल जाओ, वह लौट कर नहीं आयेगा। उसे तुम से कोई लाभ नहीं होता और तुम अपने को हानि पहुँचाते हो।

23 यह याद रखो कि उसकी गति तुम्हारी भी होगी- कल उसकी और आज तुम्हारी।

24 मृत्यु के बाद मृतक की स्मृति मिट जाने दो, उसके प्राण निकलने के बाद अपना दुःख शान्त होने दो।

25 अवकाष मिलने के कारण ही शास्त्री को प्रज्ञा प्राप्त होती है। जो काम-धन्धों में नहीं फँसा रहता, वही प्रज्ञ बन सकता है।

26 जो हल चलाता और घमण्ड से पैना भाँजता है, जो बैलों को जोतता और उनके कामों में लगा रहता है, जो अपने साँड़ों की ही बात करता है, उसे प्रज्ञा कैसे प्राप्त हो सकती है?

27 वह हल की रेखा खींचने की चिन्ता करता रहता और रात में देर तक बछड़ों को चारा देता है।

28 यही हाल प्रत्येक शिल्पकार और हर कारीगर का है, जो दिन-रात अपने काम में लगा रहता है। यही हाल उन लोगों का है, जो मुद्राएँ उकेरते हैं और निरन्तर नयी आकृतियाँ बनाते रहते हैं। ऐसा व्यक्ति सच्ची प्रतिकृति बनाने में तल्लीन रहता और रात में देर तक अपनी कृति का परिष्कार करता है।

29 यही हाल लोहार का है, जो निकाई के पास बैठ मन लगा कर लोहे का काम करता है। आग की भाप उसका शरीर गलाती है; वह भट्टी की गरमी में परिश्रम करता रहता है।

30 हथोड़े की आवाज़ उसके कानों में निरन्तर गूँजती रहती है। उसकी आँखें अपनी कृति के नमूने पर टिकी रहती हैं।

31 यह दत्तचित्त हो कर अपने कार्य में लगा रहता। और रात में देर तक उसका परिष्कार करता है।

32 यही हाल कुम्हार का है, जो अपने चाक के पास बैठ कर उसे अपने पैरों से घुमाता रहता है। वह अपने काम पर निरन्तर ध्यान रखता और समय पर उसे पूरा करने की चिन्ता करता है।

33 वह अपने हाथों से मिट्टी के लोंदे बनाता और पैरों से उसे गूँधता है।

34 वह दत्तचित्त होकर बरतनों पर रोग़न लगाता और रात में देर तक अपना आँवा साफ़ करता है।

35 इन सब को अपने हस्तकौशल का भरोसा है। ये सभी अपने-अपने कार्य में निपुण हैं।

36 इनके बिना कोई भी नगर नहीं बसाया जा सकता।

37 इनके बिना यहाँ न तो कोई रह सकता और न कोई आ-जा सकता; किन्तु नगर परिषद् में इन से परामर्श नहीं लिया जायेगा। इन्हें सार्वजनिक सभाओें में प्रमुख स्थान नहीं दिये जायेंगे।

38 ये न्यायाधीश के आसन पर नहीं बैठेंगे। ये न तो संहिता के निर्णय समझते और न शिक्षा एवं न्याय के क्षेत्र में योग देते हैं। शासकों में इन में से कोई नहीं,

39 किन्तु ये ईश्वर की सृष्टि बनाये रखते हैं। इनका काम ही इनकी प्रार्थना है।

प्रवक्ता ग्रन्थ 39

1 उस व्यक्ति की बात दूसरी है, जो पूरा ध्यान लगा कर सर्वोच्च प्रभु की संहिता का मनन करता है; जो प्राचीन काल के प्रज्ञा-साहित्य का और नबियों के उद्गारों का अध्ययन करता है।

2 वह विख्यात पुरुषों की उक्तियों को सुरक्षित रखता और दृष्टान्तों की गहराई तक पहुँचने का प्रयत्न करता है।

3 वह जीवन भर सूक्तियों की गहराई का और दृष्टान्तों की पहेलियों का अध्ययन करता रहता है।

4 वह उच्च पदाधिकारियों की सेवा में उपस्थित रहता और शासकों का द्वार उसके लिए खुला है।

5 वह विदेशी राष्ट्रों का भ्रमण करता और मनुष्यों की भलाई एवं बुराई की जानकारी रखता है।

6 वह बड़े सबेरे अपने सृष्टिकर्ता प्रभु की शरण जाता और सारे हृदय से सर्वोच्च ईश्वर से विनय करता है।

7 वह अपने होंठों से प्रार्थना करता और अपने पापों की क्षमा माँगता है।

8 यदि सर्वोच्च प्रभु ऐसा चाहेगा, तो उसे बुद्धि का आत्मा प्राप्त होगा।

9 तब वह प्रज्ञापूर्ण सूक्तियाँ बोलेगा और अपनी प्रार्थना में प्रभु की स्तुति करेगा।

10 उसका परामर्श और ज्ञान विवेकपूर्ण होगा और वह ईश्वर के रहस्यों का मनन करेगा।

11 जो शिक्षा उसे प्राप्त हुई, वह उसे प्रकट करेगा और ईश्वर के विधान के नियमों पर गर्व करेगा।

12 बहुत-से लोग उसकी बुद्धि की प्रशंसा करेंगे और वह कभी नहीं भुलायी जायेगी।

13 उसकी स्मृति नहीं मिटेगी। उसका नाम पीढ़ी-दर-पीढ़ी बना रहेगा।

14 राष्ट्रों में उसकी प्रज्ञा की चरचा होगी और सभा में उसकी प्रशंसा की जायेगी।

15 यदि वह बहुत दिनों तक जीवित रहेगा, तो उसका नाम हज़ारों से महान् होगा। और यदि उसकी मृत्यु हो जायेगी, तो उसे कोई चिन्ता नहीं होगी।

16 मैं एक बार और अपने विचार प्रकट करूँगा, क्योंकि मैं पूर्णिमा के चन्द्रमा की तरह पूर्ण हूँ।

17 भक्त पुत्रो! मेरी बात सुनो और उस गुलाब की तरफ बढ़ो, जो जलस्रोत के निकट लगाया गया है,

18 लोबान की तरह सुगन्ध बिखेरो,

19 सोसन की तरह खिलो, ऊँचे स्वर में भजन सुनाओ ओैर प्रभु के सभी कार्यों के कारण उसकी स्तुति करो।

20 उसके नाम की महिमा घोषित करो, उसका स्तुतिगान करो, गीत गाते और सितार बजाते हुए इन शब्दों में उसकी स्तुति करो:

21 . “प्रभु के सभी कार्य उत्तम हैं और उसके सभी आदेश अपने समय पर पूर्ण होते हैं”। यह मत पूछो, “यह क्या है? इस से क्या लाभ?” क्येांकि अपने समय पर सब कुछ का रहस्य प्रकट हो जायेगा।

22 उसके आदेश पर पानी एकत्र हो गया, उसके शब्द मात्र से महासागर के भण्डार भर गये।

23 उसके आदेश पर उसकी इच्छा पूरी हुई, क्योंकि उसके कल्याण-कार्य में कोई भी बाधा नहीं डाल सकता।

24 सभी मनुष्यों के कार्य उसके सामने हैं और कोई भी उसकी दृष्टि से नहीं छिप सकता।

25 वह आदि से काल के अन्त तक देखता रहता है; उसकी दृष्टि में कोई बात असाधारण नहीं।

26 यह मत पूछो, “यह क्या है? इस से क्या लाभ? ” क्यों कि सब कुछ का अपना-अपना प्रयोजन है।

27 उसका आशीर्वाद उमड़ती नदी के सदृश है,

28 जो सूखी भूमि को प्रलय की तरह सींचती है! जिन राष्ट्रों ने उसकी खोज नहीं की, उसका क्रोध उनका इस तरह विनाश करेगा,

29 जिस तरह उसने पानी को खारा कर दिया। सन्तों के लिए उसके मार्ग सीधे हैं, किन्तु दुष्टों के लिए वे काँटों से भरे हैं।

30 प्रारम्भ से ही अच्छे लोगों के लिए अच्छी चीज़ों की और बुरे लोगों के लिए बुरी चीज़ों की सृष्टि हुई।

31 मनुष्यों के जीवन के लिए ये अत्यावश्यक हैं: पानी, आग, लोहा, नमक, गेहूँ का मैदा, दूध, मधु, दाखरस, तेल और वस्त्र।

32 यह सब भक्तों के लिए कल्याणकारी हैं, किन्तु पापियों के लिए अहितकर होता है।

33 दण्ड देने के लिए आँधियों की सृष्टि हुई: प्रभु का कोप उनका संकट दुगुना कर देता है।

34 समय आने पर वे विनाशलीला रचती और अपने सृष्टिकर्ता का क्रोध शान्त करती हैं।

35 आग, ओले, अकाल और मृत्यु- इनकी सृष्टि दण्ड देने के लिए हुई है।

36 जंगली जानवरों के दाँत, बिच्छू, साँप और प्रतिशोधी तलवार, जो दुष्टों का विनाश करती है-

37 ये सब सहर्ष उसकी आज्ञा मानते हैं, इनकी उस समय के लिए सृष्टि की गयी है, जब इनकी ज़रूरत पडे़गी; समय आने पर ये उसकी आज्ञा का उल्लंघन नहीं करेंगे।

38 इसलिए प्रारम्भ से मेरी यही धारणा थी, मैंने सोच-विचार करने के बाद यह लिखा है:

39 “प्रभु के सभी कार्य उत्तम हैं, वह समय पर सब आवश्यकताएँ पूरी करता है”।

40 यह मत कहो, “यह उस से बुरा है”, क्योंकि सब कुछ अपने समय पर अच्छा प्रमाणित होगा।

41 और अब हमारे हृदय से ऊँचे स्वर में गाओे और प्रभु का नाम धन्य कहो।

सूक्ति-ग्रन्थ 23: 29-35

29 कौन दुःखी है? कौन शोक मनाता है? कौन झगड़ा लगाता है? कौन शिकायत करता है? कौन अकारण घायल हो जाता है? किसकी आंँखें लाल हैं?

30 यह उनकी दशा है, जो देर तक अंगूरी पीते हैं; जो मिश्रित अंगूरी के प्याले चखते रहते हैं।

31 लाल-लाल अंगूरी पर दृष्टि मत लगाओ, जो प्याले में बुदबुदाती है। वह पीते समय मधुर लगती है,

32 किन्तु अन्त में साँप की तरह डँसती और करैत की तरह विष उगलती है।

33 तुम्हारी आँखें बड़ा विचत्रि दृश्य देखेंगी और तुम उल्टी-सीधी बातें करोगे।

34 तुम खुले समुद्र पर यात्रा करने वाले व्यक्ति के समान होगे, जो मस्तूल के शिखर पर सोया हुआ है।

35 तुम कहोगे: “उन्होंने मुझे मारा, किन्तु मुझे चोट नहीं लगी। उन्होंने मेरी पिटाई की, किन्तु मुझे इसका पता नहीं चला। मुझे कब होश होगा? तब मैं फिर पिऊँगा।”