पठन योजना में आज पढ़ें :(योशुआ का ग्रन्थ 1 – 4), (स्तोत्र ग्रन्थ 123)

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योशुआ का ग्रन्थ 1

1 प्रभु के सेवक मूसा की मृत्यु के बाद प्रभु ने मूसा के सहायक नून के पुत्र योशुआ से कहा,

2 “मेरे सेवक मूसा की मृत्यु हो चुकी है अब तुम सब लोगों के साथ वहाँ से रवाना हो कर यर्दन पार करो और उस देश में प्रवेश करो जिस मै इस्राएलियों को दे रहा हूँ।

3 जिन जिन स्थानो पर तुम पैर रखोगे मैं उन्हें तुम्हें देता जाऊँगा जैसी कि मैने मूसा से प्रतिज्ञा की।

4 उजाड़खण्ड़ और लेबानोन से ले कर महानदी फरात तक हितियों तक फैला हुआ है तुम्हारा देश होगा।

5 जब तक तुम जीवित रहोगे कोई भी तुम्हारे सामने नहीं टिक पायेगा। जैसे मैं मूसा के साथ रहा वैसे ही तुम्हारे साथ भी रहूँगा। मैं तुम्हारी सहायता करता रहूँगा। तुम्हारा त्याग नहीं करूँगा।

6 दृढ़ बने रहो और ढारस रखो; क्योंकि तुम उस देश पर इन लोगो का अधिकार कराओगे जिसे मैंने इनके पूर्वजो को देने की शपथ खायी थी।

7 दृढ़ बने रहो और ढारस रखो। जो संहिता मेरे सेवक मूसा ने तुम को दी है उसका सावधानी से पूरा-पूरा पालन करो। उस से तुम न बायें भटको और न दाहिने। इस से तुम्हारा सर्वत्र कल्याण होगा।

8 संहिता के इस ग्रन्थ की चरचा करते रहो। दिन-रात उसका मनन करो, जिससे उस में जो कुछ लिखा है तुम उसका सावधानी से पालन करो। इस तरह तुम उन्नति करते रहोगे और अपने सब कार्यों में सफलता प्राप्त करोगे।

9 क्या मैनें तुम से यह नहीं कहा दृढ़ बनें रहो और ढारस रखो? तुम न डरोगे और न घबराओगे क्योंकि तुम जहाँ कहीं भी जाओगे प्रभु तुम्हारा ईश्वर तुम्हारे साथ होगा।”

10 तब योशुआ ने लोगों के अधिकारियों को यह आदेश दिया,

11 शिविर में चारों ओर घूम कर लोगो से कहो कि वे रसद का प्रबन्ध करें, क्योंकि उन्हें तीन दिन के अन्दर उस देश को अपने अधिकार में करने के लिए यर्दन पार करना होगा जिसे प्रभु तुम्हारा ईश्वर तुम्हें विरासत के रूप में देने वाला है।”

12 रूबेन और गाद वंश तथा मनस्से के आधे वंश के लोगो से योशुआ ने यह कहा,

13 “प्रभु के सेवक मूसा द्वारा अपने को दिया हुआ यह आदेश याद रखो कि प्रभु तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हें विश्राम करने के लिए यह देश दिया है।

14 तुम्हारी पत्नियाँ, तुम्हारे बच्चे और तुम्हारे पशु इस देश में ही रहें जिसे मूसा ने तुम्हें यर्दन के इस पार दिया है। किन्तु तुम्हारे सब योद्धा अस्त्र-शस्त्र के साथ तुम्हारे अन्य भाइयों के आगे-आगे पार चले और तब तक उनकी सहायता करते रहें,

15 जब तक प्रभु उन्हें विश्राम करने का स्थान न दे जैसा कि उसने तुम्हारे लिए किया है और जब तक वे भी उस देश पर अधिकार न करें जिसे प्रभु उन्हें देने वाला है। इसके बाद तुम लौट कर अपने देश में रहो जिसे प्रभु के सेवक मूसा ने तुम्हें यर्दन के पूर्व में दिया है।”

16 तब उन्होंने योशुआ को उत्तर दिया, “आपने जो कुछ हम से कहा हम उसे पूरा करेंगे और आप जहाँ भी हमें भेजेंगे हम वहाँ जायेंगे।

17 हम आपकी बात उसी प्रकार मानेंगे जिस प्रकार हमने मूसा की सारी बातें मानी है। प्रभु आपका ईश्वर आपके साथ वैसे ही बना रहे जैसे वह मूसा के साथ रहा।

18 जो आपके विरुद्ध विद्रोह करेगा और आपके किसी भी आदेश का पालन नहीं करेगा उसे मृत्युदण्ड़ दिया जायेगा। आप दृढ़ बने रहे और ढारस रखें।”

योशुआ का ग्रन्थ 2

1 नून के पुत्र योशुआ ने षिट्टीम से दो पुरुषों को गुप्तचर के रूप में भेजा और उन से कहा, “जाओ और उस देश के विषय में विशेष कर येरीख़ो के विषय में जानकारी प्राप्त करो। वे चल पड़े। वे राहाब नामक एक वेश्या के घर पहुँचे और वहीं ठहरे।

2 लोगो ने येरीख़ो के राजा से कहा, “इस्राएलियों के कुछ पुरुष आज रात देश का भेद लेने यहाँ आये हैं”।

3 इस पर येरीख़ो के राजा ने राहाब के पास कहला भेजा, “उन पुरुषों को बाहर कर दो जो तुम्हारे यहाँ आ कर ठहरे है क्योंकि वे सारे देश का भेद लेने के लिए आये हैं”।

4 परन्तु उस स्त्री ने दोनों पुरुषों को छिपा दिया और उत्तर भेजा, “हाँ सच ही कई पुरुष मेरे यहाँ आये थे पर मैं नही जानती थी कि वे कहाँ से आये थे।

5 अँधेरा होने पर जब नगर का फाटक बंद होने को था, उस समय वे चले गये। मैं नहीं कह सकती कि वे कहाँ चले गये। यदि आप शीघ्र ही उनका पीछा करेंगे, तो आप उन्हें पकड़ सकते हैं।

6 उसने उन पुरुषो को छत पर ले जा कर अलसी के डंठलों में छिपा दिया, जिन्हें उसने छत पर रखा था।

7 इस पर उन पुरुषांे का पीछा यर्दन के घाट तक किया गया उनका पीछा करने वालो के जाते ही नगर का फाटक बंद कर दिया गया।

8 वे पुरुष अभी सो भी न पाये थे कि राहाब उनके पास छत पर आयी और

9 उन से बोली, “मैं जानती हूँ कि प्रभु ने तुम्हें यह देश दिया है। हम पर तुम लोगो का भय छा गया है और इस देश के सारे निवासी तुम्हारे कारण आतंकित है।

10 हमने यह सुना है कि जब तुम लोग मिस्र से निकल आये थे तो प्रभु ने तुम्हारे लिए लाल समुद्र का जल सुखा दिया था और यह भी कि तुमने यर्दन के उस पार के अमोरियों के दोनों राजाओं, सीहोन और ओग, के साथ क्या किया। तुमने उनका पूर्ण संहार कर डाला।

11 यह सुन कर हमारा कलेजा दहल उठा और तुम्हारे कारण सब का साहस टूट गया क्योंकि प्रभु तुम्हारा ईश्वर ऊपर स्वर्ग और नीचे पृथ्वी सब का ईश्वर है।

12 अब तुम मुझ से प्रभु की शपथ खा कर कहो कि जिस प्रकार मैंने तुम पर कृपा की है उसी प्रकार तुम भी मेरे पिता के परिवार पर कृपा करोंगे। इस से मुझे विश्वास होगा।

13 कि तुम मेरे माता-पिता मेरे भाई-बहनों और उनके सारे संबंधियों को बचाओंगे और मृत्यु से हम लोगों की रक्षा करोगे।”

14 इस पर उन पुरुषों ने उसे उत्तर दिया, “हमारे प्राण तुम्हारे प्राणों की रक्षा के जिम्मेवार होंगे, बषर्ते तुम हमारी बात प्रकट नहीं करो। जब प्रभु ने हमें यह देश दिया होगा, तो हम ईमानदारी से तुम्हारे साथ अच्छा व्यवहार करेंगे।

15 तब उसे उन्हें एक रस्सी के सहारे खिड़की से नीचे उतार दिया क्योंकि उसका घर नगर की चारदीवारी में बना हुआ था।

16 उसने उन से कहा तुम लोग पहाड़ियों में जा छिपो जिससे पीछा करने वाले तुम्हें पकड़ नहीं पायें और जब तक पीछा करने वाले न लौटें तब तक तीन दिन वहीं छिपे रहो इसके बाद तुम आगे बढ़ सकते हो।”

17 उन पुरुषों ने उस से कहा, “तुमने हमें जो शपथ खिलायी उसे हम इसी तरह पूरा करेंगे।

18 जब हम इस देश में प्रवेश करेंगे तब तुम यह लाल रस्सी इस खिड़की पर लटका दोगी जिस से तुम हमें नीचे उतारने जा रही हो फिर तुम अपने माता-पिता अपने भाइयों ओर अपने पिता के परिवार के सब संबंधियों को अपने घर में एकत्रित कर लोगी।

19 यदि कोई तुम्हारे घर के दरवाजों से बाहर निकलेगा तो वह स्वयं अपनी मृत्यु का जिम्मेवार होगा और हम निर्दोष होंगे। हाँ यदि कोई तुम्हारे साथ तुम्हारे घर में रहने वाले किसी व्यक्ति पर हाथ उठायेगा, तो उसकी मृत्यु का उत्तरदायित्व हम पर होगा।

20 किन्तु यदि तुम हमारी यह बात प्रकट करोगी तो हम तुम से की गयी अपनी शपथ से मुक्त हो जायेंगे।”

21 उसने उत्तर दिया, “जैसा तुम लोगों ने कहा है वैसा ही होगा”। इसके बाद उसने उन्हें विदा किया और वे चल पडे़ उसने वह लाल रस्सी खिड़की में बाँध दी।

22 वे वहाँ से चल कर पहाड़ियों में पहुँचे। जब तक पीछा करने वाले वापस नहीं आये वे तीन दिन तक वहीं रूके रहें। पीछा करने वालों ने उन्हें सारे मार्ग के आसपास ढँढा, परन्तु उन्हें नहीं पाया।

23 इसके बाद वे दोनों व्यक्ति पहाड़ियों पर से उतर कर और नदी पार कर नून के पुत्र योशुआ के पास पहुँचे। उन्होंने उसे वहाँ का सारा हाल सुनाया।

24 उन्होनें योशुआ से कहा, “प्रभु सचमुच सारा देश हमारे हाथ दे रहा है उस देश के सब निवासी हम से भयभीत हो कर साहस खो चुके हैं”।

योशुआ का ग्रन्थ 3

1 योशुआ ने बडे़ सबेरे सब इस्राएलियों के साथ षिट्टीम से प्रस्थान कर दिया। वे यर्दन के पास आये और पार करने के पूर्व वहीं पडाव डाला।

2 सचिवों ने तीसरे दिन सारे शिविर में घूमकर

3 लोगों को यह आदेश दिया, “जब तुम प्रभु अपने ईश्वर के विधान की मंजूषा को लेवीवंशी याजकों द्वारा ढोये जाते देखो तब अपना-अपना स्थान छोड़ कर उसके पीछे हो लो जिससे तुम्हें यह मालूम हो सके कि तुम्हें किस रास्ते पर चलना है क्योंकि तुम इस रास्ते पर पहले कभी नहीं आये।

4 लेकिन तुम्हारे और उसके बीच दो हजार हाथ की दूरी होनी चाहिए। तुम उसके निकट नहीं जाओगे।”

5 योशुआ ने लोगो से कहा, “अपने को पवित्र बनाये रखो क्योंकि कल प्रभु तुम्हारी आँखों के सामने चमत्कार करेगा”।

6 योशुआ ने याजको से कहा, “विधान की मंजूषा उठाकर लोगों के आगे-आगे चलो”। तब उन्होंने विधान की मंजूषा उठायी और वे लोगों के आगे-आगे चल पडे़।

7 प्रभु ने योशुआ से यह कहा, “मैं आज से इस बात का ध्यान रखूँगा कि सभी इस्राएली तुम्हारा महत्व समझें और यह जान जायें कि जिस तरह मैं मूसा के साथ रहा उसी तरह तुम्हारे साथ भी रहूँगा।

8 तुम विधान की मंजूषा ढोने वाले याजको को यह आदेश दोगे, ’जब तुम लोग यर्दन नदी के तट पर पहुँचो, तो नदी में ही खडे़ हो जाओ’।”

9 इसके बाद योशुआ ने इस्राएलियों से कहा, “यहाँ आओ और अपने प्रभु ईश्वर का आदेश सुनों।”

10 योशुआ ने कहा, “अब तुम जान जाओगे कि जीवन्त ईश्वर तुम्हारे बीच है और तुम लोगों के सामने से कनानियों को निष्चय ही भगा देगा।

11 समस्त पृथ्वी के प्रभु के विधान की मंजूषा तुम लोगों से पहले यर्दन पार करेगी।

12 बारह व्यक्तियों को चुन लो हर एक वंश से एक व्यक्ति को।

13 ज्यों ही समस्त पृथ्वी के प्रभु के विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन नदी के पानी में पैर रखेंगे त्यों ही ऊपर से बहने वाला पानी थम जायेगा और ठोस पुंज जैसा हो जायेगा।”

14 जब इस्राएली अपने तम्बू उखाड़ कर यर्दन पार करने निकले तो विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक उनके आगे-आगे चलें।

15 ज्यों ही मंजूषा ढोने वाले याजकों ने यर्दन के पास जा कर पानी में पैर रखा- कटने के समय यर्दन का पानी उमड़ कर तट पर फैल जाता है –

16 त्यों ही ऊपर से बहने वाला पानी थम गया और सारतान के निकटवर्ती आदाम नगर तक ठोस पुंज- जैसा बन गया। अराबा के समुद्र अर्थात लवण समुद्र की ओर उतरने वाला पानी बह निकला और इस प्रकार इस्राएली येरीख़ो के सामने पार उतरे।

17 जब इस्राएली सूखे पाँव उस पार जा रहे थे तो प्रभु के विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन के बीच के सूखे तल पर तब तक खडे़ रहे, जब तक सभी लोग यर्दन के उस पार नहीं पहुँचे।

योशुआ का ग्रन्थ 4

1 जब सारा जनसमूह यर्दन पार कर चुका, तब प्रभु ने योशुआ से कहा,

2 “लोगों में से बारह पुरुष चुन लो -प्रत्येक वंश से एक

3 और उन्हें यह आज्ञा दो: यर्दन के मध्य से जहाँ याजकों के पाँव थे बारह पत्थर उठा कर अपने साथ ले जाओ और उन्हें उस स्थान पर रख दो जहाँ तुम आज रात ठहरोगे”।

4 इस पर योशुआ ने उन बारह पुरुषों केा बुला भेजा जिन्हें उसने इस्राएलियों के प्रत्येक वंश से चुना था।

5 योशुआ ने उन से कहा, “प्रभु अपने ईश्वर की मंजूषा के सामने यर्दन के बीच चले जाओ और इस्राएलियों के वंशो की संख्या के अनुसार तुम में से प्रत्येक एक-एक पत्थर अपने कन्धे पर उठा लाये।

6 वह तुम्हारे लिए एक स्मारक बन जायेगा। जब कभी भविष्य में तुम्हारी सन्तान तुम से पूछेगी कि इन पत्थरों का अर्थ क्या है,

7 तो तुम यह उत्तर दोगे ’जब प्रभु के विधान की मंजूषा यर्दन में उतरी तो यर्दन की जलधारा उसके सामने थम गयी – ये पत्थर इस्राएलियों के लिए इस घटना के चिरस्थायी स्मारक है।”

8 इस्राएलियों ने योशुआ की आज्ञा का पालन किया। जैसा कि प्रभु ने योशुआ को आदेश दिया उन्होंने इस्राएल के वंशो की संख्या के अनुसार यर्दन के बीच से बारह पत्थर उठाये। उन्होंने उन को अपने साथ शिविर ले जा कर वहीं रख दिया।

9 और जिस स्थान पर विधान की मंजूषा ढोने वाले याजको ने पाँव रखे थे योशुआ ने वहाँ यर्दन के बीच में बारह पत्थर स्थापित किये। वे आज तक वहाँ विद्यमान है।

10 जब तक वह सब कुछ पूरा नहीं हो पाया था जिसका प्रभु ने योशुआ द्वारा लोगों को आदेश दिया था और जो मूसा ने योशुआ से कहा था तब तक मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन के बीच खडे़ रहे। लोग जल्दी-जल्दी नदी पार करते गये।

11 जब सब लोग पार कर चुके, तब दूसरे तट पर खडे़ लोगों के देखते याजकों ने मंजूषा के साथ नदी पार किया।

12 जैसी मूसा ने उन्हें आज्ञा दी थी रूबेन, गाद और मनस्से के आधे कुल के सषस्त्र योद्धा इस्राएलियों के आगे-आगे चलते हुए पार उतरे।

13 लगभग चालीस हजार सशस्त्र योद्धा प्रभु के सामने युद्ध के लिए येरीखो के मैदान की ओर आगे बढे़।

14 उस दिन प्रभु ने योशुआ को समस्त इस्राएल की दृष्टि में इतना महान बनाया कि वे उसके जीवन भर उस पर इस प्रकार श्रद्धा रखते थे जिस प्रकार उन्होंने मूसा पर श्रद्धा रखी थी।

15 (15-16) प्रभु ने योशुआ से कहा, “विधान की मंजूषा ढोने वाले याजकों की आज्ञा दो कि वे यर्दन बाहर आयें”।

17 इसलिए योशुआ ने याजकों को आज्ञा दी, “यर्दन से बाहर आओ”।

18 जैसे ही प्रभु के विधान की मंजूषा ढोने वाले याजक यर्दन के बीच से निकल कर बाहर आये और याजको के पाँव के तलवे तट पर पडे़ वैसे ही यर्दन का पानी फिर अपने स्थान पर आ गया और पहले की तरह सर्वत्र अपने तट के ऊपर तक बहने लगा।

19 पहले महीने के दसवें दिन लोगों ने यर्दन से चलकर गिलगाल में पडाव डाला जो येरीख़ो की पूर्वी सीमा पर है।

20 योशुआ ने गिलगाल में वे बारह पत्थर स्थापित किये जिन्हें वे यर्दन से निकाल कर ले गये थे।

21 उसने इस्राएल के लोगों से कहा, “जब कभी भविष्य मे तुम्हारी सन्तान अपने पिताओं से पूछेगी कि इन पत्थरों का क्या अर्थ है,

22 तो अपने पुत्रो को इस प्रकार समझाओगे, ’इस्राएल ने यहीं सूखे पाँव यर्दन पार किया है।

23 जब तक तुमने उसे पार नहीं किया तब तक प्रभु तुम्हारे ईश्वर ने तुम्हारे लिए इस प्रकार यर्दन को सुखा दिया जिस प्रकार उसने लाल समुद्र को तब तक हमारे लिए सुखाया था जब तक हमने उसे पार नहीं किया था।

24 उसने यह इसलिए किया कि पृथ्वी के समस्त राष्ट्र जान जाए कि प्रभु का सामर्थ्य कितना महान है और तुम सदा प्रभु अपने ईश्वर पर श्रद्धा रखो’।”

स्तोत्र ग्रन्थ 123

1 मैंने तेरी ओर आँखें उठायी, तेरी ओर, जो स्वर्ग में विराजमान है।

2 जिस तरह दासों की आँखें स्वामी के हाथ पर टिकी रहती हैं, जिस तरह दासी की आँखें स्वामिनी के हाथ पर टिकी रहती हैं, उसी तरह जब तक प्रभु-ईश्वर दया न करे, हमारी आँखें उस पर टिकी हुई हैं।

3 हम पर दया कर, प्रभु! हम पर दया कर! हम तिरस्कार सहते-सहते तंग आ गये हैं।

4 हमारी आत्मा धनियों के उपहास और घमण्डियों के तिरस्कार से तंग आ गयी है।