सामान्य – काल
बारहवाँ सप्ताह
आज के संत: मोन्तेवेर्जिने के संत विलियम मठाध्यक्ष, संस्थापक
📒पहला पाठ : 2 राजाओं 19: 9-11, 14-21, 31- 36
1 यह सुनकर राजा हिज़किया ने अपने वस्त्र फाड़ डाले और टाट ओढ़ कर प्रभु के मन्दिर गया।
2 इसके बाद उसने महल-प्रबन्धक एल्याकीम, सचिव षेबना और प्रमुख याज़कों को टाट ओढ़े आमोस के पुत्र नबी इसायाह के पास भेजा।
3 उन्होंने उस से कहा, “हिज़कीया का कहना है, आज का दिन संकट, प्रताड़ना और अपमान का दिन है; क्योंकि प्रसव का दिन आया है, लेकिन प्रसूता में प्रसव करने की शक्ति नहीं रह गयी है।
4 हो सकता है कि प्रभु, आपके ईश्वर ने प्रधान रसद-प्रबन्धक की, जिसे अस्सूर के राजा ने जीवन्त ईश्वर की निन्दा करने भेजा है, उन सब बातों को सुन लिया हो और उन सब बातों के लिए उसे दण्ड दे, जिन्हें प्रभु, आपके ईश्वर ने सुना होगा। अतः उन लोगों के लिए प्रार्थना कीजिए, जो शेष रह गये हैं।”
5 जब राजा हिज़कीय के सेवक इसायाह के पास आये,
6 तब इसायाह ने उन से कहा, “तुम अपने स्वामी से यह कहोगे कि प्रभु का कथन हैः तुम उन बातों से नहीं डरो, जिन्हें तुमने सुना है और जिनके द्वारा अस्सूर के राजा के सेवकों ने मेरी निन्दा की।
7 मैं उसके मन में ऐसी भावना पैदा करूँगा कि वह कोई अफ़वाह सुन कर अपने देश लौट जायेगा और वह अपने देश में ही तलवार से मार डाला जायेगा।”
8 जब प्रधान रसद-प्रबन्धक लौटा, तो उसने सुना कि अस्सूर का राजा लाकीश छोड़ कर चला गया और लिबना में युद्ध कर रहा है। इसलिए वह भी लिबना गया।
9 राजा को खबर मिली थी कि कूष का राजा तिरहाका उस से लडने आया है। यह सुन कर अस्सूर के राजा ने फिर से हिज़कीया के पास दूतों को भेजते हुए उस से कहा,
10 “यूदा के राजा हिज़कीया से यह कहोगेः तुम अपने ईश्वर का भरोसा करते हो, जो तुम्हें यह आश्वासन देता है कि येरूसालेम अस्सूर के राजा के हाथ नही पड़ेगा। इस प्रकार का धोखा मत खाओ।
11 तुमने सुना है कि अस्सूर के राजाओं ने सब देशों का सर्वनाश किया है, तो तुम कैसे बच सकते हो?
14 हिज़कीया ने दूतों के हाथ से पत्र ले कर पढ़ा। इसके बाद उसने मन्दिर जा कर उसे प्रभु के सामने खोल कर रख दिया।
15 तब हिज़कीया ने प्रभु से इस प्रकार प्रार्थना की: “प्रभु ! इस्राएल के ईश्वर ! तू केरूबीम पर विराजमान है। तू पृथ्वी भर के सब राज्यों का एकमात्र ईश्वर है। तुने स्वर्ग और पृथ्वी को बनाया है।
16 प्रभु! तू कान लगा कर सुन! प्रभु! तू आँखें खोल कर देख! सनहेरीब के शब्द सुन, जिनके द्वारा उसने जीवन्त ईश्वर का अपमान किया है।
17 प्रभु! यह सच है कि अस्सूर के राजाओं ने राष्ट्रों का सर्वनाश किया और
18 उनके देवताओं को जलाया है। वे देवता नहीं, बल्कि मुनष्यों द्वारा निर्मित लकड़ी और पत्थर की मूर्तियाँ मात्र थे। इसलिए वे उन्हें नष्ट कर सके।
19 प्रभु! हमारे ईश्वर! हमें उसके पंजे से छुड़ा, जिससे पृथ्वी भर के राज्य यह जान जायें कि प्रभु! तू ही ईश्वर है।”
20 उस समय आमोस के पुत्र इसायाह ने हिज़कीया के पास यह कहला भेजा, “प्रभु, इस्राएल का ईश्वर यह कहता हैः मैंने अस्सूर के राजा सनहेरीब के विषय में तुम्हारी प्रार्थना सुनी है।
21 सनहेरीब के विरुद्ध प्रभु का कहना इस प्रकार है- सियोन की कुँवारी पुत्री तुम्हारा तिरस्कार ओर उपहास करती है। येरूसालेम की पुत्री तुम्हारी पीठ पीछे सिर हिलाती है।
31 येरूसालेम से एक अवशेष निकलेगा और सियोन पर्वत से बचे हुए लोगों का एक दल। विश्वमण्डल के प्रभु का अनन्य प्रेम यह कर दिखायेगा।
32 इसलिए अस्सूर के राजा के विषय में प्रभु यह कहता हैः वह इस नगर में प्रवेश नहीं करेगा और इस पर एक बाण भी नहीं छोड़ेगा। वह ढाल ले कर उसके पास नहीं फटकेगा ओर उसकी मोरचाबन्दी नहीं करेगा
33 वह जिस रास्ते से आया, उसी से वापस जायेगा। वह इस नगर में प्रवेश नहीं करेगा। यह प्रभु की वाणी है।
34 मैं अपने नाम ओर अपने सेवक दाऊद के कारण यह नगर बचा कर सुरक्षित रखूँगा।”
35 उसी रात प्रभु के दूत ने आ कर अस्सूर के राजा के शिविर में एक लाख पचासी हज़ार लोगों को मारा। प्रातः काल वे सब मर कर पड़े हुए थे।
36 अस्सूर का राजा सनहेरीब शिविर उठा कर अपने देश लौटा और निनिवे में रहा।
📙 सुसमाचार : संत मत्ती 7: 6,12-14
6 “पवित्र वस्तु कुत्तों को मत दो और अपने मोती सूअरों के सामने मत फेंको। कहीं ऐसा न हो कि वे उन्हें अपने पैरों तले कुचल दें और पलट कर तुम्हें फाड़ डालें।
12 “दूसरों से अपने प्रति जैसा व्यवहार चाहते हो, तुम भी उनके प्रति वैसा ही किया करो। यही संहिता और नबियों की शिक्षा है।
13 “सँकरे द्वार से प्रवेश करो। चौड़ा है वह फाटक और विस्तृत है वह मार्ग, जो विनाश की ओर ले जाता है। उस पर चलने वालों की संख्या बड़ी है।
14 किन्तु सँकरा है वह द्वार और संकीर्ण है वह मार्ग, जो जीवन की ओर ले जाता है। जो उसे पाते हैं, उनकी संख्या थोड़ी है।