पास्का सप्ताह

संत इसिडोर किसान, गृहस्थ

📒 पहला पाठ:1 राजाओं 21:1-16

1 यिज़्रएली नाबोत की एक दाखबारी थी, जो समारिया के राजा अहाब के महल से लगी हुई थी।

2 अहाब ने किसी दिन नाबोत से कहा, “अपनी दाखबारी मुझे दे दो। मैं उसे सब्जी का बाग बनाना चाहता हूँ, क्योंकि वह मेरे महल से लगी हुई है। मैं उसके बदले तुम्हें उस से अच्छी दाखबारी दे दूँगा या यदि तुम चाहो, तो मैं तुम्हें उसका मूल्य चुका दूँगा।”

3 किन्तु नाबोत ने अहाब से कहा, “ईश्वर यह न होने दे कि मैं आप का अपने पुरखों की विरासत दे दूँ”।

4 अहाब उदास और क्रुद्ध हो कर अपने घर चला गया, क्योंकि यिज़्रएली नाबोत ने उसे कहा था, “मैं तुम्हें अपने पुरखों की विरासत नहीं दूँगा”। उसने अपने पलंग पर लेट कर मुँह फेर दिया और भोजन करने से इनकार कर दिया।

5 उसकी पत्नी ईज़ेबेल ने उसके पास आ कर पूछा, “आप क्यों उदास हैं और भोजन करना नहीं चाहते?”

6 उसने उत्तर दिया, “मैंने यिज्ऱएली नाबोत से कहा, ‘रुपया ले कर मुझे अपनी दाखबारी दो या यदि तुम चाहो, तो मैं उसके बदले तुम को एक दूसरी दाखबारी दे दूँगा’। उसने उत्तर में कहा, ‘मैं आप को अपनी दाखबारी नहीं दूँगा’।”

7 इस पर उसकी पत्नी ईज़ेबेल ने कहा, “वाह! आप इस्राएल के कैसे राजा हैं? उठ कर भोजन करें और प्रसन्न हों। मैं आप को यिज्ऱएली नाबोत की दाखबारी दिलाऊँगी।”

8 उसने अहाब के नाम से पत्र लिखे, उन पर उसकी मुहर लगायी और उन्हें नाबोत के नगर में रहने वाले नेताओं और प्रतिष्ठित लोगों के पास भेज दिया।

9 उसने पत्रों में यह लिखा, “उपवास घोषित करो और लोगों की सभा में नाबोत को प्रथम स्थान पर बैठाओ।

10 तब उसके सामने दो गुण्डों को बैठा दो, जो उस पर यह अभियोग लगायें कि उसने ईश्वर और राजा को अभिशाप दिया है। इसके बाद उसे नगर से बाहर ले जा कर पत्थरों से मरवा डालो।”

11 नाबोत ने नगर में रहने वाले नेताओं और प्रतिष्ठित लोगों ने ईज़ेबेल के उस आदेश का पालन किया, जो उनके पास भेजे हुए ईज़ेबेल के पत्रों में लिखा हुआ था।

12 उन्होंने उपवास घोषित किया और लोगों की सभा में नाबोत को प्रथम स्थान पर बैठाया।

13 इसके बाद दो गुण्डे आये, नाबोत के सामने बैठ गये और यह कहते हुए लोगों की सभा में नाबोत के विरुद्ध साक्ष्य देने लगे, “नाबोत ने ईश्वर और राजा को अभिशाप दिया है”। लोगों ने नाबोत को नगर के बाहर ले जा कर पत्थरों से मारा और वह मर गया।

14 इसके बाद उन्होंने ईज़ेबेल के पास यह कहला भेजा, “नाबोत को पत्थरों से मारा गया और उसका देहान्त हो गया है”।

15 ईज़ेबेल ने ज्यों ही सूना कि नाबोत पत्थरों में मार डाला गया है, वह अहाब से बोली, “उठिए और यिज्ऱएली नाबोत की दाखबारी को अपने अधिकार में कर लीजिए। जो नाबोत दाम ले कर आप को अपनी दाखबारी नहीं देना चाहता था, वह अब जीवित नहीं रहा; वह मर चुका है।”

16 यह सुन कर कि नाबोत मर चुका है, अहाब तुरन्त यिज्ऱएली नाबोत की दाखबारी को अपने अधिकार में करने के लिए चल पड़ा।


📘 सुसमाचार : मत्ती 5:28-42

28 परन्तु मैं तुम से कहता हूँ- जो बुरी इच्छा से किसी स्त्री पर दृष्टि डालता है, वह अपने मन में उसके साथ व्यभिचार कर चुका है।

29 “यदि तुम्हारी दाहिनी आँख तुम्हारे लिए पाप का कारण बनती है, तो उसे निकाल कर फेंक दो। अच्छा यही है कि तुम्हारे अंगों में से एक नष्ट हो जाये, किन्तु तुम्हारा सारा शरीर नरक में न डाला जाये

30 और यदि तुम्हारा दाहिना हाथ तुम्हारे लिए पाप का कारण बनता है, तो उसे काट कर फेंक दो। अच्छा यही है कि तुम्हारे अंगों में से एक नष्ट हो जाये, किन्तु तुम्हारा सारा शरीर नरक में न जाये।

31 “यह भी कहा गया है- जो अपनी पत्नी का परित्याग करता है, वह उसे त्यागपत्र दे दे।

32 परन्तु मैं तुम से कहता हूँ- व्यभिचार को छोड़ किसी अन्य कारण से जो अपनी पत्नी का परित्याग करता है,  वह उस से व्यभिचार कराता है और जो परित्यक्ता से विवाह करता है, वह व्यभिचार करता है।

33 “तुम लोगों ने यह भी सुना है कि पूर्वजों से कहा गया है- झूठी शपथ मत खाओ। प्रभु के सामने खायी हुई शपथ पूरी करो।

34 परन्तु मैं तुम से कहता हूँः शपथ कभी नहीं खानी चाहिए- न तो स्वर्ग की, क्योंकि वह ईश्वर का सिंहासन है;

35 न पृथ्वी की, क्योंकि वह उसका पावदान है; न येरुसालेम की, क्योंकि वह राजाधिराज का नगर है

36 और न अपने सिर की, क्योंकि तुम इसका एक भी बाल सफेद या काला नहीं कर सकते।

37 तुम्हारी बात इतनी हो- हाँ की हाँ, नहीं की नहीं। जो इस से अधिक है, वह बुराई से उत्पन्न होता है।

38 “तुम लोगों ने सुना है कि कहा गया है- आँख के बदले आँख, और दाँत के बदले दाँत।

39 परन्तु मैं तुम से कहता हूँ- दुष्ट का सामना नहीं करो। यदि कोई तुम्हारे दाहिने गाल पर थप्पड़ मारे, तो दूसरा भी उसके सामने कर दो।

40 जो मुक़दमा लड़ कर तुम्हारा कुरता लेना चाहता है, उसे अपनी चादर भी ले लेने दो

41 और यदि कोई तुम्हें आधा कोस बेगार में ले जाये, तो उसके साथ कोस भर चले जाओ।

42 जो तुम से माँगता है, उसे दे दो और जो तुम से उधार लेना चाहता है, उस से मुँह न मोड़ो।